Thursday, August 08, 2019


हिन्दी के अग्रणी और हम लोगों के अग्रज कवि मंगलेश डबराल ने कल फेसबुक पर एक पोस्ट डाली है जो इस प्रकार है: “हिंदी में कविता, कहानी, उपन्यास बहुत लिखे जा रहे हैं, लेकिन सच यह है कि इन सबकी मृत्यु हो चुकी है हालांकि ऐसी घोषणा नहीं हुई है और शायद होगी भी नहीं क्योंकि उन्हें खूब लिखा जा रहा है. लेकिन हिंदी में अब सिर्फ 'जय श्रीराम' और 'बन्दे मातरम्' और 'मुसलमान का एक ही स्थान, पाकिस्तान या कब्रिस्तान' जैसी चीज़ें जीवित हैं. इस भाषा में लिखने की मुझे बहुत ग्लानि है. काश, मैं इस भाषा में न जन्मा होता!”

फासिस्ट बर्बरता के जिस गहराते घटाटोप के प्रति मंगलेश ने अपनी गहन खिन्नता जाहिर की है, उसे हम सहज ही समझ सकते हैं! लेकिन मैं विनम्रतापूर्वक यह निवेदन करना चाहती हूँ कि उनकी यह प्रतिक्रिया अतिरेकी और भावावेशपूर्ण होने के कारण असंतुलित हैI जाहिर है कि इस प्रतिक्रिया पर भी काफ़ी अतिरेकी प्रतिक्रियाएँ आ रही हैं, लेकिन मैं इसपर संजीदगी से कुछ बातें कहना चाहती हूँI भारत में हिन्दुत्ववादी फासिज्म आज पूरे उफान पर हैI सड़कों पर उन्माद और बर्बरता का ऐसा पैशाचिक नृत्य पहले कभी नहीं देखा गया था I लेकिन किसी भी तरह से हम यह नहीं कह सकते कि हिन्दी में अब सिर्फ़ 'जय श्रीराम' और 'मुसलमान का एक ही स्थान, पाकिस्तान या कब्रिस्तान' के लिए ही स्थान रह गया हैI ऐसा कहना उन सभी जेनुइन सेक्युलर और रेडिकल फासिस्ट-विरोधी रचनाकारों के उद्यमों को सिरे से ख़ारिज करने के समान होगा जो अभी भी बिना घुटना टेके धारा के विरुद्ध खड़े हैं, भले ही उनकी आवाज़ पर बड़ी आबादी कान न दे रही होI हिन्दी के लेखक कवि "अवार्ड वापसी गैंग" कहलाने वाले लोगों में बड़ी संख्या में मौजूद थेI सभी वाम-जनवादी कवि-लेखक न तो सत्ता-प्रतिष्ठानों और अकादमियों के चक्कर लगा रहे थे, न नामवर सिंह की तरह फासिस्टों और गुंडों के साथ मंचासीन हो रहे थे, न लीलाधर जुगाड़ी की तरह लीलाएँ कर रहे थे, न ही आलोकधन्वा की तरह आलोक बिखेरने में नीतीश कुमार की मदद ले रहे थे, न रविभूषण की तरह पदीदउ के दार्शनिक अवदानों पर लेख लिख रहे थेI वैसे मेरे ख़याल से, हिन्दी पट्टी की सड़कों पर उन्मादी भीड़ के नारों से नहीं बल्कि ग्लानि तो इस बात से अधिक होनी चाहिए कि हम जिस भाषा में लिखते हैं उसमें ऐसे-ऐसे कवि-लेखक मौजूद हैं जो फासिस्ट सत्ता के साथ मधुयामिनी मनाने में भी शर्मो-हया नहीं महसूस करते I और यह भी क्या शर्म की बात नहीं है कि फासिज्म और बुर्जुआ सत्ता की निरंकुशता के विरुद्ध घोषित तौर पर खड़े अधिकांश साहित्यकारों ने भी ऐसे लोगों से न दूरी बनाई, न ही उनकी सार्वजनिक भर्त्सना की!

सडकों पर भीड़ के उन्मादी नारों और भीड़ की हिंसा के लिए इस देश का और उत्तर भारत का विशेष इतिहास और आज के पूँजीवाद की चरम पतनशीलता ज़िम्मेदार है, इसके लिए हिन्दी भाषा को ज़िम्मेदार ठहराना कुछ-कुछ उस आंग्ल कुलीनता से ग्रस्त बुद्धिजीवियों की लकीर पर सोचने जैसा होगा जो अधिकांश सामाजिक-राजनीतिक बुराइयों की जड़ "गोबर-पट्टी" (हिन्दी-पट्टी) के पिछड़ेपन और जड़ता में ढूँढते रहते हैं और “प्रबुद्ध निरंकुश” बौद्धिकों की भाषा में जनता को कोसते रहते हैंI

भाषा-संस्कृति पर फासिस्टों के वर्चस्व की कोशिशों के विरुद्ध प्रति-वर्चस्व का संघर्ष, बुरी से बुरी स्थिति में भी, पूरी आक्रामकता के साथ होना चाहिए, न कि अपनी भाषा पर शर्मिन्दा होकर और हथियार डालकर! हिन्दी-पट्टी में फासिस्टों की भीड़ अगर सड़कों पर उन्मादी नारे लगा रही है, तो भला यह कविता-कहानी या उपन्यास की मृत्यु कैसे मान ली जाए और कोई लेखक अपनी भाषा पर शर्मिन्दा क्यों हो? फिर मेरा सवाल यह भी है कि एक हिन्दी का लेखक ही हिन्दी भाषा में पैदा होने पर क्यों शर्मिन्दा हो? उन्मादी नारे तो गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक में भी कम नहीं लग रहे हैं! भीड़ की हिंसा और बुद्धिजीवियों पर फासिस्ट गिरोहों के हमलों की घटनाएँ वहाँ भी घट रही हैं! फिर तो गुजराती, मराठी और कन्नड़ लेखकों को भी अपनी-अपनी भाषाओं में पैदा होने पर शर्मिन्दा होना चाहिएI इस तर्क को आगे बढ़ाया जाये तो हमें तो भारत में ही पैदा होने पर शर्मिन्दा होना चाहिए जहाँ फासिस्ट नंग-नाच इस कदर वहशीपन के साथ जारी है!

माना कि हिन्दी-पट्टी की सड़कों पर आज फासिस्ट नारों की गूँज है! थोड़ा और आगे बढ़कर यह भी माना जा सकता है कि राष्ट्रीय, जनवादी और बुर्जुआ मानवतावादी साहित्य की हमारी जो परम्परा है, उसका एक बड़ा हिस्सा कम या ज्यादा धार्मिक संकीर्णता और साम्प्रदायिकता से प्रभावित रहा है! पर इसके सुनिश्चित ऐतिहासिक कारण रहे हैं! यह विश्लेषण का विषय है, न कि शर्मिन्दा होने का! और यह भी नहीं भूलना चाहिए कि राहुल सांकृत्यायन, गणेशशंकर विद्यार्थी, रामवृक्ष बेनीपुरी, राधामोहन गोकुल, प्रेमचंद, यशपाल, भीष्म साहनी, मुक्तिबोध, नागार्जुन, शमशेर, त्रिलोचन आदि-आदि भी हमारी परम्परा हैं और फासिस्ट घटाटोप की किसी भी दुर्वह स्थिति में हम अपनी इस परम्परा पर गर्व करना नहीं छोड़ सकते! बात को यूँ समझें कि जर्मनी की सडकों पर जब नात्सी गुंडे क़त्लो-गारत का तूफ़ान मचाये हुए थे तो क्या जन-पक्षधर जर्मन साहित्यकार इस बात पर सोग मना रहे थे कि कहाँ से कहाँ वे जर्मन भाषा में पैदा हो गए? क्या उन्होंने हेगेल, फायरबाख, शिलर, गोएठे, हाइने आदि-आदि पर गर्व करना स्थगित कर दिया था? फासिस्ट और उनके उन्मादी नारे देर-सबेर इतिहास की कचरा पेटी के हवाले कर दिए जायेंगे, लेकिन एक भाषा और संस्कृति की आत्मिक विरासत को कभी भी विस्मृत नहीं किया जा सकता! हमें अपनी भाषा की वैचारिक-आत्मिक संपदा को समृद्ध करते हुए दिमागों के उपनिवेशन के विरुद्ध उसी तरह संघर्ष करना चाहिए जैसा न्गूगी वा थ्योंगो सुझाव देते हैं !

(26 जुलाई, 2019)

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