Tuesday, August 06, 2019


हिन्दी के प्रगतिशीलों की जिन स्त्री-विषयक कविताओं में चूल्हे फूँकती, रोटी बेलती, पुरुष की हर ज़रूरत को पलक झपकते समझ जाती, उसके कामों की महत्ता समझती और उसकी परेशानियों से चिंतित होने वाली, "प्रेम तथा ममता की छाँव" बनी स्त्री का "मार्मिक" बखान किया जाता है, वे कविताएँ निहायत कुटिलता के साथ गृहणीत्व के रूप में स्त्रीत्व का महिमा-मंडन करती हैं ! ऐसी कविताओं से पहले मुझे चिढ़ होती थी, अब घिन होती है ! स्त्री का जो घरेलूपन, दब्बूपन और पालतूपन है, वह चूल्हे-चौकठ की भौतिक गुलामी से पैदा हुई मानसिक दासता से अधिक कुछ नहीं है ! ज्यादातर प्रगतिशील मर्दों को भी ऐसी "गुणवती", "सुशील" स्त्रियाँ बहुत भाती हैं ! उन्हें अपना "साथ देने वाली" स्त्री बहुत प्यारी लगती है, पर ऐसी स्त्री नहीं जिसका अपना स्वतंत्र चिंतन और कामों का स्वतंत्र दायरा हो, यूँ कहें कि जो बराबर के दर्जे की नागरिक हो ! माना कि स्त्री अपनी नैसर्गिक विशिष्टता के साथ प्यार करती है और ममत्व उसकी विशिष्टता है ! पर इसतरह तो पुरुष-सुलभ ढंग से प्यार करना और पितृत्व पुरुष की भी विशिष्टता है ! फिर स्त्री को ही "प्यार और ममत्व की प्रतिमूर्ति" जैसी बद्धमूल छवियों में क़ैद क्यों कर दिया जाता है ! हिन्दी की अधिकांश प्रगतिशील कविताओं में भी स्त्री अक्सर दया और संरक्षण-मूलक प्यार की पात्र बनकर आती है और हिन्दी का कवि उसे सहानुभूति और करुणा की बारिश में भिगोकर सराबोर करता रहता है I गृहकार्यों में दक्ष, सहनशील, घरेलू, दब्बू, पालतू स्त्री उसे कुछ ज्यादा ही भाती है I आप याद कीजिए कि प्रगतिशील पुरुष कवियों की कविताओं में स्वतंत्र विचारों वाली, बहस करने वाली, सवाल उठाने वाली, मतभेद दर्ज कराने वाली, अपनी राह खुद बनाने वाली और विद्रोह करने वाली स्त्री-छवियाँ कितनी आयी हैं ? निश्चय ही अपवाद हैं, लेकिन बहुत कम हैं !

(22जुलाई, 2019)

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