रूढ़िबद्ध, बीमार समाज में, फासिस्ट उन्मादियों के आतंक-राज्य में, प्रेम करना भी एक विद्रोह है ! सच्चा प्रेम जो सम्पूर्ण बराबरी, स्वतंत्र इच्छा और निजी निर्णय की पूर्ण स्वतन्त्रता पर आधारित होता है, वह निर्भय होता है, मानवीय सार-तत्व की उदात्ततम-काव्यात्मक अभिव्यक्ति होता है ! वह जाति-धर्म या किसी भी रूढ़ि से बंधा नहीं हो सकता ! वह अपनी प्रकृति से बेपरवाह और विद्रोही होता है !
लड़कियो ! रूढ़ियों-परम्पराओं के नागपाशों को तोड़कर भौतिक-मानसिक चारदीवारियों से बाहर निकालो, सामाजिक मुक्ति की लड़ाई लड़ते हुए स्वयं को मुक्त करो, चीज़ों को बदलते हुए खुद को बदलो, प्रेम-द्रोही गुंडों की आँखों में मिर्ची पाउडर झोंक दो, वे क्या तुम्हें दौडायेंगे, तुम उन्हें डंडा लेकर सड़कों पर खदेड़ो ! देखो, इस बीमार समाज के पोर-पोर में किस क़दर स्त्री-विरोधी बर्बरता भर गयी है ! रोजाना, हर घंटे देश में हो रही बलात्कार, ह्त्या, तेज़ाब डालने और यौन-उत्पीड़न की घटनाओं पर निगाह डालो और सोचो कि क्या विद्रोह और संघर्ष के अतिरिक्त हमारे सामने जीने का कोई और रास्ता भी बाकी बचा है ?
स्वजनों-परिजनों द्वारा प्यार और देखभाल की चाशनी में डुबोकर परोसे जाने वाली गुलामी और रूढ़ियों के ज़हरीले भोजन को नाली में फेंक दो ! भेड़-बकरी की तरह शादी के नाम पर किसी खूँटे से बाँधे जाने से विद्रोह करके घर छोड़ दो, अपने बारे में खुद निर्णय लो, चाहे वह सिंगल रहने का निर्णय हो या अपनी मर्जी से प्रेम करके लिव-इन में रहने या शादी करने का ! बर्बर जाति-व्यवस्था से घृणा करो और उसे लात मार दो ! शादी में स्त्री-विरोधी धार्मिक रीति-रिवाजों का पालन मत करो !
सामाजिक मुक्ति के संघर्ष में भागीदारी किये बिना अन्याय और गुलामी के सागर में अपनी निजी मुक्ति का द्वीप नहीं बनाया जा सकता ! और जाति-धर्म और पुरुषस्वामित्ववाद की तमाम संस्थाओं और मूल्यों के विरुद्ध एक आमूलगामी, प्रबल वेगवाही सामाजिक-सांस्कृतिक आन्दोलन का झंझावात उठाये बिना सामाजिक-राजनीतिक ढाँचे को बदलने के क्रांतिकारी संघर्ष को भी आगे नहीं बढ़ाया जा सकता !
आधी आबादी की ही आधी ज़मीन है और आधा आकाश, पर वह तोहफ़े में नहीं मिलेगा ! उसके लिए लड़ना होगा, एक नया सामाजिक ढाँचा बनाने के लिए लड़ना होगा !
आज़ाद इंसान की तरह जीना हो तो लड़ना होगा, वरना गुलाम की तरह तो जी ही रही हो I
(28दिसम्बर, 2018)
लड़कियो ! रूढ़ियों-परम्पराओं के नागपाशों को तोड़कर भौतिक-मानसिक चारदीवारियों से बाहर निकालो, सामाजिक मुक्ति की लड़ाई लड़ते हुए स्वयं को मुक्त करो, चीज़ों को बदलते हुए खुद को बदलो, प्रेम-द्रोही गुंडों की आँखों में मिर्ची पाउडर झोंक दो, वे क्या तुम्हें दौडायेंगे, तुम उन्हें डंडा लेकर सड़कों पर खदेड़ो ! देखो, इस बीमार समाज के पोर-पोर में किस क़दर स्त्री-विरोधी बर्बरता भर गयी है ! रोजाना, हर घंटे देश में हो रही बलात्कार, ह्त्या, तेज़ाब डालने और यौन-उत्पीड़न की घटनाओं पर निगाह डालो और सोचो कि क्या विद्रोह और संघर्ष के अतिरिक्त हमारे सामने जीने का कोई और रास्ता भी बाकी बचा है ?
स्वजनों-परिजनों द्वारा प्यार और देखभाल की चाशनी में डुबोकर परोसे जाने वाली गुलामी और रूढ़ियों के ज़हरीले भोजन को नाली में फेंक दो ! भेड़-बकरी की तरह शादी के नाम पर किसी खूँटे से बाँधे जाने से विद्रोह करके घर छोड़ दो, अपने बारे में खुद निर्णय लो, चाहे वह सिंगल रहने का निर्णय हो या अपनी मर्जी से प्रेम करके लिव-इन में रहने या शादी करने का ! बर्बर जाति-व्यवस्था से घृणा करो और उसे लात मार दो ! शादी में स्त्री-विरोधी धार्मिक रीति-रिवाजों का पालन मत करो !
सामाजिक मुक्ति के संघर्ष में भागीदारी किये बिना अन्याय और गुलामी के सागर में अपनी निजी मुक्ति का द्वीप नहीं बनाया जा सकता ! और जाति-धर्म और पुरुषस्वामित्ववाद की तमाम संस्थाओं और मूल्यों के विरुद्ध एक आमूलगामी, प्रबल वेगवाही सामाजिक-सांस्कृतिक आन्दोलन का झंझावात उठाये बिना सामाजिक-राजनीतिक ढाँचे को बदलने के क्रांतिकारी संघर्ष को भी आगे नहीं बढ़ाया जा सकता !
आधी आबादी की ही आधी ज़मीन है और आधा आकाश, पर वह तोहफ़े में नहीं मिलेगा ! उसके लिए लड़ना होगा, एक नया सामाजिक ढाँचा बनाने के लिए लड़ना होगा !
आज़ाद इंसान की तरह जीना हो तो लड़ना होगा, वरना गुलाम की तरह तो जी ही रही हो I
(28दिसम्बर, 2018)

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