Monday, January 07, 2019

पूँजी जब आयेगी तो अपने साथ बर्बरता की संस्कृति लेकर ही आयेगी


आगरा और पौड़ी की बर्बर घटनाओं के बाद यू.पी. में एक लड़की की सरेआम गोली मारकर ह्त्या कर दी गयी और झारखंड में बलात्कार के बाद अपराधी युवती का सिर काट ले गए !

बात सिर्फ़ कानून-व्यवस्था की नहीं है ( और जहाँ थानों में बलात्कार होते हों, जजों पर यौन-दुर्व्यवहार के आरोप हों और नेताओं और नौकरशाहों के व्यभिचारों-दुराचारों पर तो किसी को आश्चर्य तक न होता हो, वहाँ कानून के रखवालों से आप उम्मीद भी क्या कर सकते हैं ! ) ! मूल बात यह है कि हम गंभीर रूप से रुग्ण, उन्मादी और बर्बर पूँजीवाद के युग में जी रहे हैं ! इतिहास का प्रवाह जब भी कभी रुक जाता है तो ठहरे हुए जल में ऐसी ही सड़ांध और तरह-तरह के विषैले कीट पैदा होते हैं ! संकटग्रस्त पूँजीवाद घिसट-घिसट कर जी रहा है और इंसानियत पर कहर बरपा कर रहा है ! पूँजीवाद का जो ढाँचागत संकट युद्ध, तबाही और बर्बर शोषण के साथ-साथ आत्मिक रिक्तता, सांस्कृतिक संकट, अलगाव, विमानवीकरण और फासीवाद को जन्म दे रहा है, वही स्त्रियों, बच्चों, और दलितों को भी, यानी जो कमजोर हैं उन्हें अपना शिकार बना रहा है !

औपनिवेशिक सामाजिक संरचना की कोख से जन्मा भारतीय पूँजीवाद, तो जन्मना ही रुग्ण और विकलांग रहा है ! हमारे समाज के ताने-बाने में जनवादी मूल्यों की हमेशा से कमी रही है I इस पूँजीवाद के पास केवल लोभ-लाभ और अंधी प्रतिस्पर्द्धा की संस्कृति रही है और तमाम प्राक-पूँजीवादी मूल्यों-संस्थाओं को भी इसने पुनर्संसाधित करके अपना लिया है I इसमें नयी बर्बरता भी है और पुरानी बर्बरतायें भी !

स्त्रियों के ऊपर ज़ुल्म की जैसी घटनाएँ हाल के दिनों में देखने को मिली हैं, वे बताती हैं कि हमारा समाज बीमार, बहुत अधिक बीमार है ! इस विभीषिका के विरुद्ध स्त्रियों को एक लम्बी लड़ाई लड़नी होगी I दूरगामी तौर पर यदि देखें तो,उन्हें व्यवस्था-परिवर्तन की लड़ाई में हिस्सा लेना होगा और स्त्री-मुक्ति के प्रश्न को शोषण-मुक्त समाज बनाने की लड़ाई से जोड़ देना होगा ! एक प्रबल वेगवाही सामाजिक-सांस्कृतिक आन्दोलन के बिना क्रांतिकारी बदलाव की लड़ाई आगे बढ़ ही नहीं सकती I स्त्रियों को परम्पराओं-रूढ़ियों के विरुद्ध संगठित होकर विद्रोह का बिगुल बजाना होगा, घिनौनी जाति-व्यवस्था के नाश के लिए जुझारू आन्दोलन संगठित करने के प्रयासों का भागीदार बनना होगा ! इसके साथ ही, यह समझ लेना ज़रूरी है कि कानून के रखवालों से अधिक उम्मीद किये बिना अपनी सुरक्षा के लिए उन्हें खुद ही संगठित होना होगा, आत्मरक्षा दस्ते और मुहल्लों में चौकसी दस्ते बनाने होंगे, नशे और अपराध के अड्डों पर हल्ला बोलना होगा, जन-अदालतें लगाकर गुंडों-लफंगों और उनके सरपरस्तों को दण्डित करना होगा I यह काम करने में सुधारवादी "बहनजी लोग" और एनजीओ-पंथी भिखमंगिनें आपकी कोई मदद नहीं करेंगी ! वे बौद्ध भिक्षुणियों की तरह घंटा डोलाती रहेंगी I ये इसी व्यवस्था के सेफ्टी-वॉल्व हैं ! इनसे सावधान रहना होगा ! ये आन्दोलनों को दन्त-नखहीन बनाने के लिए पैठाई गयी मायाविनियाँ हैं ! इनसे सावधान !!

(26दिसम्‍बर, 2018)



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पूँजी जब आयेगी तो अपने साथ बर्बरता की संस्कृति लेकर ही आयेगी I पौड़ी की घटना के बाद अब कर्णप्रयाग में एक छात्रा के साथ सामूहिक बलात्कार !

पूँजीवादी संस्कृति के कहर का मुकाबला करना हो तो स्त्रियों को पूँजी की सत्ता के विरुद्ध एक लम्बी लड़ाई में भागीदार बनना होगा I दूसरी बात यह कि कानून-व्यवस्था और पुलिस प्रशासन से सुरक्षा की आस व्यर्थ है I बेशक़ प्रशासन पर दबाव बनाना होगा, पर अपनी सुरक्षा अपने बूते करनी होगी, संगठित होना होगा, चौकसी दस्ता और स्वयंसेवक दस्ता बनाना होगा, सार्वजनिक जन अदालतें लगाकर लम्पटों-लफंगों को दण्डित करना होगा ! घरों में दुबकने की जगह घरों से बाहर आना होगा, लड़कियों को मार्शल आर्ट का प्रशिक्षण लेना होगा, आत्मरक्षा करने और लड़ने का कौशल सीखना होगा !

जो धार्मिक कट्टरपंथी फासिस्ट स्त्रियों की आज़ादी को कुचलकर उन्हें घरों में क़ैद कर देना चाहते हैं और रूढ़ियों में जकड़ देना चाहते हैं, वे बलात्कार जैसी घटनाओं के लिए स्त्रियों की "आज़ादी" को ही ज़िम्मेदार ठहराते हैं ! फासिज्म की संस्कृति उन्मादियों की जो भीड़ तैयार करती है, उसमें स्त्रियों के प्रति, विशेषकर आज़ाद और आधुनिक स्त्रियों के प्रति नफ़रत कूट-कूट कर भरी होती है ! जो रुग्ण और संकटग्रस्त पूँजीवादी समाज फासिज्म की नर्सरी बन चुका होता है, उसमें सड़कों पर मानव-वेशी स्त्रीभक्षी भेड़िये घूमते रहते हैं ! 'रघुपति राघव राजाराम' गाने और शांति-मन्त्र पढ़ने की जगह मशाल लेकर इन भेड़ियों का पीछा करना होगा ! भेड़िये आग से डरते हैं !

(27दिसम्‍बर, 2018)



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