यूनानी दार्शनिक थुसिदिदीस ने कहा था कि जो समाज अपने विद्वानों को अपने योद्धाओं से अलग कर देता है, उसमें चिंतन का काम कायर करते हैं और लड़ने की ज़िम्मेदारी मूर्ख निभाते हैं I
इस सूक्ति से प्रेरणा लेते हुए आज के भारतीय कम्युनिस्ट आन्दोलन के बारे में कुछ बातें की जा सकती हैं I कम्युनिस्ट आन्दोलन में चिंतन-कर्म की गहनता-गंभीरता और योद्धा-वृत्ति की वीरता, युयुत्सा का ऑर्गनिक संश्लेषण होगा, तभी वह अपनी आतंरिक ऊर्जस्विता को कायम रखते हुए आगे की ओर गतिमान होगा I भारत में एक ओर तो निठल्ले, अकर्मण्य, कैरियरवादी और कायर अकादमिक कम्युनिस्टों की भरमार हो गयी है जो विद्वत्ता के मामले में भी कंगले, कूपमंडूक, अमौलिक, छिछले और अहम्मन्य हुआ करते हैं, अभिजन समाज के ऊपरी स्तरों पर जीते हैं, आन्दोलन और संघर्षों से कोसों दूर रहते हैं और नसीहतें झाड़-झाड़कर अपनी कुंठाओं का शमन करते रहते हैं I दूसरी ओर ऐसे कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी कार्यकर्ता-संगठनकर्ता हैं जो आनन-फानन में राज्य-सत्ता को पलट डालने के पेटी-बुर्जुआ भावुकतावादी जोश और कुर्बानी के जज्बे से लबरेज होते हैं लेकिन सर्वहारा क्रांति के विज्ञान के अध्ययन से कोसों दूर होते हैं I क्रांति महज विद्रोह नहीं होती I क्रांति अगर महज वीरता और कुर्बानियों के जज्बे से ही हो जाया करती तो फिर मार्क्सवाद की पुस्तकों की ज़रूरत ही क्या थी ! जाहिर है कि मैं यहाँ संशोधनवादी संसदीय जड़-वामनों की नहीं, जेनुइन कम्युनिस्ट क्रांतिकारियों की बात कर रही हूँ I अपने विचारधारात्मक दिवालियेपन के चलते ही आज बहुतेरे कम्युनिस्ट क्रांतिकारी "सरकारी वामपंथी चिंतकों", कायर किताबी कीड़ों, भगोड़ों और विलासी लम्पटों को भी गंभीर बुद्धिजीवी मानकर तरजीह देते हैं और अनजाने ही आन्दोलन की शान में बट्टा लगाते हैं I
जो लोग मार्क्सवादी विज्ञान, अपने देश की सामाजिक-आर्थिक संरचना, आज के साम्राज्यवाद और अतीत की क्रांतियों के अनुभवों के समाहार को समझे बिना आनन्-फानन में हथियार उठाकर क्रांति कर देना चाहते हैं, और तुर्रा यह कि, क्रांति भी वे आज से 60-70 वर्षों पहले हुई क्रांतियों के मॉडल को दुहराते हुए करना चाहते हैं, वे लोग अपनी सारी क्रांतिकारी भावना के बावजूद क्रांति की लहर का काफ़ी नुकसान कर रहे हैं I कठमुल्लावाद से काम नहीं चलेगा, और ठेके के मुक्त चिंतकों से "ज्ञान" उधार लेकर इस कमी की भरपाई नहीं की जा सकेगी I अपने विचारधारात्मक आधार को मज़बूत करना होगा, आज की देश-दुनिया का अध्ययन करना होगा, अतीत के अनुभवों का समाहार करके समाजवाद की समस्याओं और उनके समाधानों को समझना होगा और गहन चिंतन के इस काम के साथ-साथ जन-समुदाय को साहसपूर्वक जागृत, गोलबंद और संगठित करना होगा I इसमें कोई 'शॉर्टकट' संभव नहीं है I क्रांतिकारी योद्धा और वैज्ञानिक -- दोनों एक साथ होते हैं !
(19दिसम्बर, 2018)

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