मैं दूर देस से आती, दूर देस को जाती एक मुसाफिर हूँ | इस सराय में मुझे रात भर आराम करने दो |
मैं घास के विस्तृत मैदान में कहीं छुपा हुआ खरगोश हूँ | ओ थक चुके बच्चो, मुझे ढूँढ़ना छोड़कर घर लौट जाओ |
मैं एक चिट्ठी हूँ जो या तो गंतव्य तक पहुँचूँगी या ‘डेड लेटर ऑफिस' | मुझसे वापस लौटने की उम्मीद मत करो | मैं जिस लिफ़ाफ़े में बंद हूँ, उसपर भेजने वाले ने अपना पता लिखा ही नहीं है |
मैं हूँ हिम प्रदेश में लावारिस पड़े पर्वतारोही के जूते | मेरे भीतर अभी भी आरोहण की चाह है | मुझे किसी नये पर्वतारोही की प्रतीक्षा करने दो |
मैं तट पर छूट गयी एक लहर हूँ | मेरे भीतर सागर तक लौटने का सपना है | मुझे उस सपने को जीने दो |
मैं घाटी की घास पर बिखरी हुई राख हूँ | मुझे बटोरने की कोशिश मत करो | अगली बारिश में मुझे खाद बनकर जड़ों तक पहुँचना है |
मैं एक यातना भरी चुप्पी की चीत्कार, एक दबी हुई सिसकी, रात के सन्नाटे की एक आह हूँ | मुझे सुनने की कोशिश करो |
मैं दीवारों की जड़ों में चुपचाप पड़ा बारूद हूँ |मुझे अभी उकसाओ मत | प्रतीक्षा करने दो |
मैं सन्नाटे के विरुद्ध एक षड्यंत्र हूँ | चाहो तो मेरे साथ मेरे अंजाम तक चलो |
मैं स्मृति, कल्पना, स्वप्नों और फंतासी की गलियों में भटकता यथार्थ हूँ | दुनियादार लोगो, मेरा पीछा करना छोड़ दो |
(2नवम्बर,2018)

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