वह एक बहुत विशाल संग्रहालय के निदेशक थे I वहाँ यादें चीज़ों में सुरक्षित थीं । वह एक विशाल सुनसान था जहाँ कोई नहीं आता था । वह उस संग्रहालय की बहुत सरोकार और जतन से देखभाल करते थे । सिर्फ़ अपने लिए ।
#दून_डायरी
(24अक्टूबर,2018)
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...पहाड़ के मध्य वर्गीय बुद्धिजीवियों का एक बड़ा हिस्सा समझौतापरस्त और अवसरवादी है, इसलिए सत्ता से चिपकने को आतुर रहता है I मोदी शासन में नौकरशाही के शीर्ष और संवेदनशील पदों पर बैठे उत्तराखंडी महानुभाव इसकी मिसाल हैं ! ( इससमय विशेष रूप से चर्चित सुरक्षा सलाहकार के अतिरिक्त सेना प्रमुख, रेलवे के प्रमुखऔर पी.एम्.ओ. के प्रमुख -- ये सभी पहाड़ी हैं ! ) और प्रसून जोशी ही क्यों, लीलाधर जगूड़ी भी तो हैं, जो वामपंथी कवि भी हैं और भाजपाई मुख्यमंत्री को अपना पिता भी घोषित करते रहे और फिर कांग्रेसी शासन काल में हिमालय में बड़े बाँध बनाने की नीति की पुरज़ोर वकालत करते रहे I विडम्बना यह है कि पहाड़ के भले लोग भी ऐसे लोगों की पहले दबी ज़ुबान से आलोचना करते हैं और कुछ दिनों बाद गलबहियाँ डालकर घूमने लगते हैं ! सोचना होगा कि पहाड़ के अधिकांश जनांदोलन यदि कालान्तर में सुधारवाद और समझौतापरस्ती के दलदल में धँस जाते हैं तो इसमें नेतृत्व देने वाले पहाड़ी बुद्धिजीवी वर्ग की कितनी भूमिका है ! आज समूचे उत्तराखंड में पूँजीपतियों द्वारा वित्त-पोषित एन.जी.ओ.सुधारवाद का बोलबाला है और एन.जी.ओ. द्वारा परोसी गयी मलाई चाटते हुए पहाड़ के बुद्धिजीवियों का एक बड़ा हिस्सा जन-संघर्षों की धार को भोथरा बना रहा है !
(राजीव लोचन साह की एक पोस्ट पर टिप्पणी)
(27अक्टूबर,2018)
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सच्चाई यह है कि दून घाटी ने अपने नए बाशिंदों के हिसाब से अपने को ढाल लिया है I अलगाव-ग्रस्त यंत्र-मानव कांक्रीट के जंगलों और गंदे-विषाक्त जल-प्रवाहों के बीच रहने के अभ्यस्त अभिशप्त प्राणी होते हैं I प्रकृति से अधिक सामाजिक ढाँचा मनुष्य के व्यक्तित्व का निर्माण करता है I फिर मनुष्य प्रकृति को भी अपनी छवि में ढालने लगता है I
दून घाटी के पुनरुद्धार के लिए प्रकृति-प्रेमी और पर्यावरणवादी चाहे जितनी छाती पीट लें, घाटी की पारिस्थितिकी को बदलने के लिए यहाँ के मनुष्यों को बदलना होगा और यहाँ के मनुष्यों को बदलने के लिए उनके मानस-निर्माण के वस्तुगत सामाजिक आधार को, यानी सामाजिक ढाँचे को बदलना होगा I और यह सवाल पूरे देश के सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक ढाँचे को बदलने से जुड़ा हुआ है I दून घाटी कोई द्वीपीय देश नहीं है, या उत्तराखंड कोई स्वतंत्र राष्ट्र-राज्य नहीं है I घाटी और पर्वत के निवासियों को अपनी द्वीपीय मानसिकता से मुक्त होना होगा I द्वीपीय मानसिकता कूपमंडूक बनाती है I
देहरादून अगर राज्य की राजधानी रहेगा तो तमाम नौकरशाह,पूँजीपति,व्यापारी, भूस्वामी, नेता और पहाड़ों के पुराने अभिजात यहाँ बंगले और अपार्टमेन्ट बनाते ही रहेंगे, शौपिंग माल्स और होटलों की संख्या बढ़ती ही जायेगी और घाटी की तबाही होगी ही I सभी सम्पत्तिशाली देहरादून में ही राजधानी चाहेंगे, जबतक कि भारी जन-दबाव उन्हें मज़बूर न कर दे I और बात सिर्फ़ इतनी ही नहीं है ! पहाड़ के जो आम लोग पहाड़ के गाँवों-कस्बों के उजड़ते जाने का काफी रोना रोते हैं, उनमें से भी जिसके लिए संभव हो पाता है, वह किसी भी तरह से दून घाटी में एक प्लाट खरीद लेना चाहता है, या तराई के किसी शहर में सेटल हो जाना चाहता है I कारण यह है कि पहाड़ों में रोजगार के अवसर नहीं हैं और जीवन कठिन है और इसके लिए पूँजीवादी नीतियाँ ज़िम्मेदार हैं I
समझना इस बात को होगा कि पूँजीवादी लूट की हवस जितना श्रम-शक्ति को निचोड़ती है, उतना ही प्रकृति को भी निचोड़ती है I उत्तराखंड के पर्यावरण को बचाने की लड़ाई पूँजीवादी व्यवस्था के विरुद्ध लडे बिना नहीं लड़ी जा सकती I देश के जिन सुदूर पर्वतीय क्षेत्रों, पठारों और वन-प्रान्तरों में प्राकृतिक संसाधनों की लूट और विनाशकारी परियोजनायें पर्यावरण पर कहर बरपा कर रही हैं और करोड़ों लोगों को अपनी जगह-ज़मीन से दर-बदर होने के लिए मज़बूर कर रही हैं, ये सारी लड़ाइयाँ जबतक अलग-अलग क्षेत्रीय लड़ाइयों के रूप में लड़ी जाती रहेंगी, तबतक पराजित होती रहेंगी I इन्हें एक कड़ी में पिरोना होगा और इनकी धार को केन्द्रीय राज्यसत्ता की और मोड़ना होगा I
गौरतलब है कि पर्यावरण को बचाने का संघर्ष विकास-विरोधी नहीं, बल्कि मुनाफ़ा-केन्द्रित अनियोजित विकास और पूँजीवादी अराजकता-विरोधी संघर्ष है I समाजवाद यदि नकली न होकर वास्तविक हो तो वह पर्यावरणीय संतुलन के साथ विकास करता है I वह न इंसानों की श्रम-शक्ति को लूटकर उन्हें तबाह करता है, न ही प्रकृति को तबाह करता है I यानी प्रकृति और पर्यावरण को बचाने की लड़ाई भी पूँजीवाद-विरोधी लड़ाई का ही एक अंग है I इसी रूप में वह सफल हो सकता है I पूँजीवाद के बने रहते हुए पर्यावरण को बचने की सोच एक यूटोपिया है !
(5नवम्बर,2018)
#दून_डायरी

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