Tuesday, May 08, 2018

एक अर्थहीन कथा की शीर्षकहीन कविता


*
स्मृतियाँ नींद की तरह आती हैं
और वह हलके-हलके थरथराते जल की सतह से
नीचे तली की ओर उतरती चली जाती है I
वहाँ स्वप्न-छायाएँ देती हैं
दर्द से राहत देने वाली थपकी,
कहीं गूँजते हैं, ज्यों कहीं
किसी सघन वन-प्रांतर में,
सांत्वना के शब्द I
कोई थम्हा देता है उसके हाथों में
एक माया-दर्पण और एक विशाल, जादुई
पितृ-वृक्ष की टहनियाँ और फिर उसे
ज्ञान के नीम-अँधेरे और दुःस्वप्नों के कुहासे से भरी
गुफा में धकेल दिया जाता है I
वहाँ वह स्त्री जीती है भुगतने के लिए
और फिर एक ऐसी मौत मरने के लिए
जिसपर कहीं कोई शोक नहीं मनायेगा I
पर जबतक वह जीती है
दीवारों में चोर दरवाज़े तलाशती रहती है,
निरर्थकता से लड़ती रहती है
और पंखों के उगने की बेकल प्रतीक्षा करती रहती है I
*
-- कविता कृष्णपल्लवी
(24 अप्रैल, 2018)

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