Tuesday, February 13, 2018



अगर सच्चे लेखक हो
तो सच को सच कहो
झूठ को झूठ
काले को काला
और सफ़ेद को सफ़ेद।
सूअर को सूअर कहो
गू को गू
कातिल को कातिल
और फासिस्ट को फासिस्ट।
अगर सच्चे लेखक हो
तो रौशन राजधानियों के
लकदक संस्कृति-प्रतिष्ठानों से
बाहर निकलो
हत्यारों के खून सने हाथों से
पुरस्कार लेना
झुककर उनके हाथों को
चूमना बंद करो
झुकी हुई रीढ़ सीधी करो
चलो उन अंधेरी घुटन भरी
मेहनतक़शों की बस्तियों में
जहां गलियों में लहू
बह रहा है बेआवाज़
पर जीवन जग रहा है।
यंत्रणा और मृत्यु के सामने सीधे तनकर
खड़े होने का यही समय है I
कला जिस जीवन-सौन्दर्य की धड़कन होती है,
साहित्य जिन मानवीय मूल्यों और न्याय
और उम्मीदों का घोषणापत्र होता है,
उनकी हिफाज़त के लिए
सडकों पर मोर्चा लेने के दिन
फिर आ गए हैं ।
जो कवि-लेखक
इस दायित्व से कतरायेगा
वह देखते ही देखते एक दिन
तिलचट्टा या कनखजूरा बन जायेगा।

--कविता कृष्‍णपल्‍लवी
(9 फरवरी 2018)

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