Sunday, February 11, 2018

रामू की कहानियॉं




(एक)
एक तिलस्मी यथार्थवादी भारतीय कहानी
 रामू ने एक दिन बहुत उत्पात मचाया । फिर रामू ने रामू को गिरफ्तार कर लिया । रामू की अदालत में रामू का मुकदमा चला । रामू ने रामू पर अभियोग लगाए और फिर रामू ने रामू का बचाव किया । जज रामू अभियुक्त रामू को दोषमुक्त करने के बारे में सोच ही रहा था कि सरकार रामू ने आदेश जारी कर दिया कि रामू पर मुक़द्दमा चलाया ही नहीं जा सकता ।
 इसतरह सरकार ने जनता के प्रति अपना कर्तव्य निभाया और न्याय की लंगोटी उतरते-उतरते रह गई ।

 (दो)
एक भुतहा यथार्थवादी भारतीय कहानी
एक दिन रामू ने कहा कि रामू इस देश का बेटा है ।
फिर एक दिन रामू ने कहा कि रामू इस देश का बाप है ।
फिर एक दिन रामू ने कहा कि यह देश रामू का है ।
फिर रामू ने कहा कि रामू ही देश है ।
फिर रामू ने कहा कि इस देश में रहना होगा तो रामू-रामू कहना होगा ।
फिर रामू ने कहा कि इस देश में रहने का अधिकार सिर्फ रामू का होगा ।
अंत में रामू ने कहा कि इतने सबकुछ के बावजूद, जो रामू नहीं है, उसकी हम रामू में रामू कर देंगे ।
रामू हरदम डरा रहता है कि फिर भी ढेरों लोग हैं जो रामू नहीं हैं और एक दिन वे सब मिलकर रामू की रामू में रामू कर देंगे, जैसा कि लाख कोशिशों के बावजूद पहले भी हो चुका है ।

 (तीन)
रामू पर निबंध
रामू अपना नाम इतिहास में दर्ज़ कराना चाहता है । पर रामू इतिहास से नफ़रत भी करता है, क्योंकि जब भी वह इतिहास की कोई बात करता है, वह ऐतिहासिक रूप से हास्यास्पद हो जाती है ।
रामू ऐसा इतिहास लिखना चाहता है जिसमें रामू ही रामू हो ।
रामू कोई भी शब्द लिखता है तो वह कुछ का कुछ हो जाता है । वह लिखता है विकास, तो विनाश लिख जाता है।
रामू देश का भाग्य-विधाता बनना चाहता है । वह तय करता है कि लोग क्या खाएं, क्या पहनें और किसकी जय बोलें ।
रामू राष्ट्र-नायक बनना चाहता है । पर लोगों से यह सच क्या हमेशा छिपा रह पाएगा कि रामू दामू का चीमू है ?
खुद वह कुछ नहीं, बस चीं पूँ है ।

(चार)
हिन्दी बाल पोथी में एक पाठ
 पाठ संख्या -- बारह
 योगी रामू
 रामू बहुत स्वस्थ रहता है। रामू नियमित योगासन करता है। रामू अपने अनुयाइयों से योगासन कराता है।
रामू उत्तानपादासन करता है तो रामू के भक्त सर्वांगासन करते हैं। रामू हलासन करता है तो उसके सभी भक्त शीर्षासन करने लगते हैं। रामू और रामू के भक्तों को शीर्षासन करते हुए ही दुनिया को देखने की आदत है। उन्हें यही अच्छा लगता है।
रामू पवनमुक्तासन करके पेट की सारी गैस निकाल देता है और वायु-विकार से मुक्त हो जाता है। फिर वह पूरे देश से भस्त्रिका, कपालभाति और अनुलोम-विलोम प्राणायाम करने के लिए कहता है ताकि उसके पेट से विसर्जित गैस लोगों के फेंफड़ों में चली जाये और वायुमंडल प्रदूषणमुक्त हो जाए। रामू गंदगी पसंद नहीं करता, वह स्वच्छता के लिए अभियान चलाता रहता है।
 रामू को सभी आसनों में शवासन सबसे अधिक पसंद है। वह रोज सुबह सभी आसनों के बाद शवासन करता है और चाहता है कि पूरा देश रोजाना चौबीसों घंटों शवासन करता रहे। जितने अधिक लोग शवासन में पड़े रहते हैं, रामू उतना ही हर्षित होता है। रामू जब हर्षित होता है तो पवनमुक्तासन करने लगता है।

(पांच)
हिन्दी बाल पोथी में एक पाठ
 पाठ संख्या तेरह

चमत्कारी रामू
वह देखो। वह रामू है।
रामू कहता है कि वह बचपन में चाय बेचता था। लेकिन वह चूरन बेचनेवालों की तरह बोलता है। रामू बहुत भाषण देता है।
रामू झोला उठाए देश-विदेश घूमता रहता है। रामू तरह-तरह के कपड़े पहनना पसंद करता है। लोग रामू को जोकर कहते हैं। रामू बहादुर है। वह किसी की परवाह नहीं करता।
रामू चमत्कारी है। हत्यारे और तड़ीपार तक को वह प्रतिष्ठित आदमी बना देता है। रामू को ऐसे लोग पसंद हैं। रामू को लोगों के पीछे गुप्तचर लगा देना बहुत पसंद है। रामू स्त्रियों की सुरक्षा की बहुत चिंता करता है।
गाय रामू की माता है। पर रामू की एक और माता है। समय-समय पर रामू किसी नदी, शहर, राज्य या देश को भी अपनी माता बताता रहता है।
रामू आगे और पीछे जैसे कई शब्दों का अर्थ उल्टा जानता है। जब वह आगे जाने की बात करता है तो पीछे जाता है। वह सबको आगे ले जाने की बात कहकर पीछे ले जाता है। रामू जब शांति की बात करता है तो अशांति का बवंडर आ जाता है।
 रामू एक ऐसा तांगा बना रहा है जिसमें घोडा पीछे की ओर जुतेगा।
 रामू कहता है कि वह देश को नई ऊंचाई पर ले जाएगा। इसबार रामू उल्टा नहीं बोल रहा है। देश को नई ऊंचाई पर ले जाने की शुरुआत उसने कुछ लोगों से कर दी है। बाकी लोग अभी नीचे जा रहे हैं। रामू कहता है कि वे भी ऊपर जाएंगे। रामू उनसे इंतज़ार करने के लिए कहता है।
रामू बहुत रोता है। वह बार-बार रोता है। वह हमेशा भीड़ में रोता है। फिर वह अकेले में हँसता है। जब रामू हँसता है तो सड़कों पर खून, उन्माद और बीमारियाँ फ़ेल जाती हैं। फिर रामू भीड़ में रोता है और फिर अकेले में हँसता है। इसीलिए लोग कहते हैं कि रामू चमत्कारी पुरुष है। उसमें किसी देवता का वास है।
रामू कहता है कि वह अकेला रामू नहीं है। बहुत सारे रामू हैं, उनमें से वह भी एक रामू है। लेकिन तय है कि रामू ही सबसे बड़ा रामू है।
कुछ लोग कहते हैं कि पहले भी रामू हुए हैं। अस्सी-नब्बे साल पहले यूरोप में पैदा हुए रामू ने जो चमत्कार किए थे, उनके बारे में कुछ लोगों को पता है। कुछ लोगों को नहीं पता है।

(छ:)
रामू का भयंकर दुखड़ा : एक रहस्य-रोमांच कथा
लोग रामू की समस्या एकदम नहीं समझते। रामू अपना दुखड़ा आखिर रोये भी तो किससे और कैसे? लोग तो रामू के रोने की बात सुनते ही हँसने लगते हैं।
रामू की समस्या इतनी विचित्र और भयानक है कि वह इसे किसी को बताए भी तो कैसे बताए !
लोग दूसरी तमाम बातों के अतिरिक्त इस बात के लिए भी रामू का मज़ाक उड़ाते हैं कि वह दिन में कई बार पोशाकें बदलता रहता है। लोग नहीं जानते कि यह रामू का शौक नहीं मजबूरी है। चलिये आपको वह भयानक बात बता ही दूँ जो मुझे रामू की उस नौकरानी से पता चला जो उसकी नौकरी छोड़ चुकी है। होता यह है कि रामू जो भी कपड़े पहनता है, उसपर दोपहर बाद कुछ हल्के धब्बे उभरने लगते हैं और शाम होते-होते वे खून के गाढ़ा ताज़ा सुर्ख़ धब्बों में तबदील हो जाते हैं। ये धब्बे कभी आगे, कभी पीछे, कभी आस्तीन पर -- कहीं भी उभरने लगते हैं। रामू हमेशा घबराया रहता है कि खून के ये धब्बे कहीं किसी को दिखाई न दे जाएँ। इसीलिए वह दिन में कई-कई बार कपड़े बदलता है और ज़्यादा से ज़्यादा चटख और भड़कीले कपड़े पहनता है ताकि यदि कहीं खून के धब्बे सरेआम उभर भी आयें तो छिपे रहें।
एक दिन रामू ने एक जुगत भिड़ाई । उसने खून के ही रंग की, या काले या कत्थई रंग की तरह-तरह की पोशाकें सिलवाईं जिन्हें पहनने पर खून के धब्बे दिखाई ही न दें। लेकिन जैसे ही वह इन पोशाकों को पहनता था, वे खून से तर-ब-तर हो जाती थीं और उनसे टपकता हुआ खून फर्श पर बहने लगता था। रामू ने ऐसी सारी पोशाकों को जला देने का हुक्म दे दिया।
रामू को लगता है कि अदृश्य आत्माएँ उसे सता रही हैं। इन अदृश्य आत्माओं को भगाने के लिए रामू भारत के कोने-कोने से ही नहीं, अफ्रीका तक से ओझा-गुनी बुला चुका है। लेकिन कोई भी उपाय काम नहीं आया।
और अब तो मामला और अधिक गंभीर हो चुका है। रामू को कभी-कभी आईने में अपने चेहरे पर खून के छींटे दिखाई देते हैं। वह भागकर वाश बेसिन के सामने जाता है और मुँह पर बेतहाशा पानी के छींटे मारने लगता है। फिर जब वह साबुन से हाथ धोता है, तो लगता है जैसे हाथ में लगा खून पानी के साथ बह रहा है। कभी-कभी तो नलके से भी पानी की जगह खून आने लगता है।
अब विश्वस्त सूत्रों से ताज़ा खबर यह मिली है कि आधी रात को रामू को ऐसी भयानक आवाज़ें सुनाई देती हैं मानो किसी इंसान को ज़िबह किया जा रहा हो या किसी के पेट में त्रिशूल भोंका जा रहा हो या किसी स्त्री पर दर्जनों वहशी दरिंदे एक साथ टूट पड़े हों।
रामू के नौकरों को लग रहा है कि रामू धीरे-धीरे पागल होता जा रहा है। एक बूढ़े नौकर का कहना है कि रामू तो पहले से ही पागल है। उसकी पत्नी शंका प्रगट कर रही थी कि कहीं यह रामू वही रामू तो नहीं है जिसे भेड़ियों ने पाला था !

 (सात)
रामू का सपना
बरसों से रामू को एक सपना आता था। सपने में सबकुछ बहुत साफ नहीं होता था। चारो ओर घना कोहरा छाया होता था। कोहरे के बीच दूर क्षितिज पर एक सिंहासन टंगा होता था। गहरी धुंध में रामू को सिंहासन की ओर जाती सीढ़ियाँ दीखती थीं और वह बगटुट उनकी ओर भागता था। जैसे ही वह पहली-दूसरी सीढ़ियों पर पैर रखता था, वे उसे नरम, पिलपिली-सी जान पड़ती थीं। रामू लड़खड़ा कर गिरता था। फिर उसे चारो तरफ से घायल मनुष्यों की चीत्कार जैसी आवाज़ें सुनाई देने लगती थीं। रामू जैसे किसी दलदल में धँसता चला जाता था। नींद से जागकर वह उठ बैठता था -- घबराहट नहीं बल्कि एक किस्म की बेचैनी भरी उत्सुकता से भरा हुआ। वह लगातार आसमान में टंगे सिंहासन की ओर जाने वाली सीढ़ियों के बारे में सोचता रहता था, जिन्हें वह घने कोहरे के कारण देख नहीं पाता था।
समय बीतता गया। ज़िंदगी में रामू हर बाधा को हर मुमकिन तरीके से ठिकाने लगाकर तरक्की के नए-नए मुकाम हासिल करता रहा। रामू अब एक बहुत शक्तिशाली आदमी बन चुका था। मगर उसे वह सपना बदस्तूर आता रहा।
फिर धीरे-धीरे ऐसा हुआ कि रामू के सपने में छायी धुंध भी हल्की पड़ने लगी। रामू अब और शक्तिशाली, सबसे शक्तिशाली बनना चाहता था और इसके लिए कुछ भी कर गुजरने को तैयार था।
फिर वह रात आई जब रामू के सपने में कोई धुंध नहीं थी। रामू ने जैसे ही आसमान में टंगे सिंहासन की ओर जाती सीढ़ियों पर पैर रखा, उसने देखा कि वे सीढ़ियाँ लाशों से बनी थीं -- युवाओं की, बच्चों की, स्त्रियों की, वृद्धों की लाशें ... तरह-तरह की लाशें ... क्षत-विक्षत, सड़ी हुई और विकृत लाशें ... अनगिन लाशें... -- पर सभी लाशें फटी-फटी आँखों से रामू को घूर रही थीं। रामू इससे बिना डरे-घबराये पैर जमाकर सीढ़ियाँ चढ़ने लगा। लेकिन इतने में उसे कहीं से ढेर सारे बच्चों का शोर सुनाई दिया, जैसे किसी स्कूल से छुट्टी के बाद एक साथ ढेरों बच्चे बाहर सड़क पर निकल आए हों। रामू घबराकर चीख पड़ा और उठ बैठा। जागकर उसने खुद को पसीने से सराबोर पाया।

(अाठ)
रामू ने कविता लिखी
समय बीतने के साथ रामू ज्यादा से ज्यादा शक्तिशाली होता चला गया Iरामू जो भी चाहता, कर और पा सकता था I लेकिन फिर भी कहीं कोई कमी रह गयी थी, कोई अतृप्ति, कोई अपूर्ण आकांक्षा जो रामू को लगातार सालती रहती थी।
आखिर धीरे-धीरे रामू ने अपनी उस चाहत की भी शिनाख्त कर ली। रामू का मन कविता लिखने को ललक रहा था। रामू ने बहुतेरे कवियों पर कृपा की थी, उन्हें पद-पीठ-प्रतिष्ठा दी थी। पर स्वयं कविता लिखने की बात ही कुछ और थी। शब्दों का यह खेल रामू को जादू सरीखा लगता था। बचपन में गुरूजी के खूब डंडे खाकर भी रामू किसी कविता की दो पंक्तियाँ याद नहीं कर पाता था। बहरहाल, रामू ने अपनी यह दिली चाहत अपने अकेले राज़दार दोस्त श्यामू तड़ीपार के सामने रखी। फिर क्या था, रामू को कविता सिखाने के लिए फ़ौरन एक तजुर्बेकार उस्ताद को उनके घर से टांग लाया गया।
उस्तादजी ने रामू को कविता के रहस्य, गुर और तकनीक सिखाने की शुरुआत छन्दशास्त्र और सौंदर्यशास्त्र की पढ़ाई से की I सौन्दर्यशास्त्र के अमूर्तनों से तो रामू को न जाने क्यों उबकाई सी आने लगती थी I उसने फैसला सुनाया कि वह बिना सौंदर्यशास्त्र पढ़े कविता लिखेगा I उस्तादजी ने कहा, कोई बात नहीं और फिर छंदशास्त्र पढाने लगे, क्योंकि उनका मानना था कि छंदमुक्त कविता में भी जीवन की लय वही साध सकता है जिसे छंदों का अभ्यास हो I रामू को सैनिक अनुशासन पसंद था, इसलिए वह भी छंदबद्ध कविता को ही कविता मानता था क्योंकि उसमें शब्द उसे बेहद अनुशासित लगते थे I लेकिन छंदशास्त्र की जब पढ़ाई शुरू हुई और मात्रिक-वर्णिक छन्द आदि के बारे में बताया जाने लगा तो रामू का भेजा हिल गया I उसने उस्तादजी को गुर्राकर आदेश दिया कि वह उसे कविता लिखने का शॉर्टकट बतायें और छंदशास्त्र के पचड़े में न फंसायें I उस्तादजी का माथा घूम गया I गला सूख गया I
फिर उन्होंने रामू को एक आसान रास्ता बताया I सबसे पहले उन्होंने रामू को शब्द खोजकर तुक मिलाने की तरक़ीब बताई I उन्होंने बताया कि पहले इन शब्दों को नोट कर लीजिये I फिर इनके पीछे भाव के हिसाब से वाक्य जोड़ देने होंगे और उनकी मात्राएँ गिनकर समान कर देनी होंगी जोड़-तोड़ करके I रामू खुश हुआ I सबसे पहले उसने राष्ट्रीय गौरव पर कविता लिखने के लिए तुक वाले शब्द जुटाने शुरू किये I 'देश' से तुक मिलाकर उसने दूसरा शब्द ढूंढा -- 'गणवेश', फिर 'कलेश', 'पेश', 'शेष' और 'ठेस' I तुक वाले कुछ शब्द तो मिल गए पर लाख कोशिश करके भी रामू कविता नहीं लिख पाया I फिर रामू ने गंगा पर कविता लिखने के लिए तुक वाले शब्द जुटाने शुरू किये I 'गंगा' के तुक में सिर्फ 'चंगा','नंगा','लफंगा','पंगा' और 'दंगा' शब्द ही उसके दिमाग में आये और यह कविता भी बनने से रह गयी।
फिर उस्तादजी ने सलाह दी कि पहले बिना विषय सोचे वह किसी भी शब्द से तुक मिलाने का अभ्यास करे I उन्होंने रामू को जब 'छन्द' शब्द से तुक मिलाने को कहा तो रामू 'कलाकंद','दंदफंद','मतिमंद' और 'गंद' से आगे कुछ भी नहीं सोच पाया I हारकर उस्तादजी ने नयी तरक़ीब निकाली I उन्होंने रामू से कहा कि उसके दिमाग में बस जो भी ख़याल आयें, उन्हें वह गुनगुनाता जाये और तुक मिलाता जाये I कभी-कभी इसतरह से भी, दिल में जो भाव होते हैं, वे स्वतः कविता में आ जाते हैं।
कई दिनों तक गुनगुनाते रहने के बाद आखिरकार रामू से एक कविता बन ही गयी जो कुछ इसतरह थी :
"आना जी आना हमारे दर आना
टेंट में हो जो कुछ, हमें दे जाना
हम हैं फ़कीर, हमसे क्या पाना
चलो नापो रस्ता, सुनाओ मत ताना "
इन पंक्तियों के बाद अचानक रामू को अपने स्वच्छता मिशन की याद आ गयी और तुरत उसके मुंह से यह पंक्ति निकल पडी --
"खुले में कभी मत करना पाखाना"
इस कविता को सुनाने के बाद उस्तादजी को दिल का दौरा पड गया। लेकिन रामू ने अपना अभ्यास उत्साहपूर्वक जारी रखा और अर्थ सोचे बिना कई दिनों तक कुछ-कुछ गुनगुनाता रहा Iफिर उसकी जो दूसरी कविता बनी, वह कुछ इसतरह थी :
"ये तो अपना धंधा है
भले कहो तुम गन्दा है
थैली-थैली चन्दा है
धंधा फिर भी मंदा है
लोकतंत्र का फंदा है
खुश अपना हर बन्दा है"
उस्तादजी तब अस्पताल की बेड पर लेटे थे। कविता सुनकर वे कराहते हुए बोले, "यह कविता बहुत यथार्थवादी है और आजकल यथार्थवाद चलन में नहीं है I" पास में श्यामू बहुत चिंतित खडा था। उसने सकुचाते हुए कहा,"सरजी, ये दिल की बात अपने आप कविता में आ जाने वाली तकनीक कुछ ठीक नहीं है, इससे काफी समस्याएँ पैदा हो सकती हैं।"
बात कुछ-कुछ रामू की समझ में भी आने लगी थी I रामू को अब कविता से नफ़रत होने लगी थी, लेकिन फिर भी उसे लगता था कि एक ताकतवर आदमी की ख्याति एक कवि के रूप में भी होनी ही चाहिए I सवाल अब चाहत का नहीं बल्कि ज़रूरत का था I अतः कुछ ज़रूरी फैसले लिए गए I उस्तादजी को रामू के लिए कविता लिखने का काम सौंप दिया गया और उन्हें साहित्य अकादमी का अध्यक्ष बना दिया गया।
रामू कविता भी लिखता है -- इस बात से रामू की प्रतिष्ठा में चार चाँद लग गए। रामू वास्तव में कविता से नफ़रत करता है लेकिन कवियों को पालतू बनाना उसे अच्छा लगता है।
कुछ कवि रामू को पितातुल्य, कुछ भ्रातातुल्य, कुछ गुरुतुल्य और कुछ ईश्वरतुल्य बताते हैं। रामू खुश होता है।

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