Tuesday, February 13, 2018

क्रान्तियाँ



-- पाब्‍लो नेरूदा

उच्‍च पदासीन
कीड़ों के खाये हुए कीचड़ के
अपने चोगों सहित गिरे,
नामहीन लोगों ने कंधों पर भाले ताने,
दीवारें ढहा दीं,
आततायी को उसके सोने के द्वार पर कीलों से ठोंका,
या अपनी बाँहदार कमीजों में, बस,
कारखानों, दफ्तरों, खानों में
एक छोटी-सी
सभा में गए।
ये वर्ष
मध्‍यांतर
के
थे।
सोने के दाँतोवाला त्रुजिल्‍लो धराशायी हुआ,
और निकारागुआ में
एक सोमोजा गोलियों से
छलनी हुआ,
अपने दलदल में रक्‍त-स्राव करता मरा,
ताकि एक दूसरा सोमोजा-चूहा
उस मरे हुए चूहे की जगह
पाले की तरह प्रकट हो;
लेकिन वह बहुत दिन न टिक पायेगा।
सम्‍मान और अपमान, उन भयानक दिनों की
विपरीत झंझाएँ!
किसी अबतक छिपी जगह से वे कवि के पास
एक धूमिल जय-पत्र की माला लाये
और उसे पहनाया।
गाँवों से वह अपने चमड़े का ढोल
और पत्‍थर का तूर्य
लिये गुज़रा।
ग्रामीणों ने,
जिन्‍होंने अँधेरे में पाठ पढ़ा था
और भूख को एक धर्म-ग्रंथ की तरह जानते थे,
कवि की ओर आधी मुँदी आँखों से देखा, जिसने ज्‍वालामुखियों,
नदियों, लोगों और मैदानों को पार किया था,
और वे जान गये कौन था वह।
अपने पर्णों के नीचे
उन्‍होंने
उसे शरण दी।
कवि
वहाँ अपने एकतारे के और
छड़ी के साथ था, जिसे उसने पहाड़ों में
किसी सुगंधपूर्ण वृक्ष से काटा था,
और जितने ही ज्‍यादा कष्‍ट उसने सहे,
उतना ही ज्‍यादा उसने सीखा,
उतना ही ज्‍यादा उसने गाया।
उसे मानव परिवार
उसकी अपनी खोयी माताएँ,
अपने पिता,
असंख्‍य
पितामह, संतानें मिल गयी थीं,
और इस तरह उसे हजारों
भाइयों के होने की आदत पड़ी।
इस तरह उसे अकेलेपल की पीड़ा नहीं सहनी पड़ी।
इसके अतिरिक्‍त, उसने अपने एकतारे और
अपनी जंगली छड़ी के साथ
चट्टानों के बीच
एक अन्‍तहीन नदी के तट पर
अपने पाँव शीतल किये।
कुछ नहीं होता था या कुछ नहीं
होता जान पड़ा --
जल, शायद, जो अपने पर ही
सरकता जाता था,
स्‍फटिकता से
गाता हुआ।
लौह-वर्ण के जंगल ने
उसे घेर रखा था।
वह स्थिर बिंदु था,
इस ग्रह का
नीलतम, शुद्ध केंद्र,
और वह वहाँ अपने एकतारे के साथ पहुँचा था,
चट्टानों और
हरहराते हुए जल के
बीच,
और कुछ नहीं होता था,
विस्‍तृत मौन,
और निसर्ग के लोक की धड़कन
और शक्ति के सिवा।
लेकिन, बहरहाल,
एक गहन प्‍यार,
एक क्षुब्‍ध सम्‍मान उसकी नियति थी।
जंगलों और नदियों से बाहर
वह निकला।
उसके साथ, एक स्‍वच्‍छ खड्ग की तरह,
उसके गान की आग चलने लगी।


(अनुवाद: चन्‍द्रबली सिंह)




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