Monday, July 07, 2014

नया अग्नि पुराण : कुछ अंश



-- कविता कृष्‍णपल्‍लवी

(एक)

भे‍ड़ि‍यों से डरते नहीं हम।
भेड़ि‍ये आग से डरते हैं।
हमने आग को वश में किया है।
हम आग से लोहा गलाते हैं।

(दो)

एक चिनगारी छिटकती है
और समूचे जंगल में आग लग जाती है।
आतंक की बारिश में
आग हमारे दिलों में जागती रहती है।
भट्ठियों में अहर्निश
गलता रहता है जो लोहा
वह बहता है जब सड़कों पर
तो सब कुछ गला देता है
उन्‍हें भी राख कर देता है
जो सहलाते रहते हैं
भेड़ि‍ये की पूँछ के बाल।


(तीन)

बस्तियों को घेर रखा है भे‍ड़ि‍यों ने।
बस्तियों में घूम रहे हैं सियार।
बच्‍चे आग के पास सो रहे हैं सपनों की तरह।
संकल्‍प और मंसूबे रतजगा कर रहे हैं।
आग से डरते हैं
भे‍ड़ि‍ये और सियार -- दोनों ही।

(चार)

सहस्‍त्राब्दियों से संचित है यह आग
जो हमारी धमनियों-शिराओं में
लहू बनकर बहती है
जब हम खटते हैं खेतों-कारखानों में,
यह पसीना बन बाहर आती है।
जब हम उठ खड़े होते हैं,
यह जुझारू नारों की लपट बन जाती है।
जब हम लड़ते हैं
तो यह हमारे परचम के
लाल रंग में दमकती है।

(पाँच)

पीले शैतान के शहर में
छापाखाने कर रहे हैं
झूठे शब्‍दों की काली बरसात।
विचारों की दुनिया में चुप्‍पी का षड्यंत्र।
संघर्षों के सौदागर विकल निराशा में
भितरघाती बन कर रहे हैं
नंगी बेशर्म कापालिक क्रिया
कुत्‍सा प्रचार और दुरभिसंधि की
आभासी दुनिया के एक मलकुण्‍ड में गोते लगाते हुए।
इन सबको इंतजार और उम्‍मीद है
आग बुझ जाने की।
यह आग दमन की बर्फबारी में
बुझेगी भी तो फिर-फिर जल उठती रहेगी।
मेहनत और हुनर की बस्‍ती में
चकमक पत्‍थर के चन्‍द टुकड़े ही नहीं
एक पूरी चट्टान है
और बारूद की एक पोटली ही नहीं, पूरी खदान है।

(छ:)

बुद्धि विलास और मयनोशी के आलम में
जो रोज़ बहकते हैं,
नहीं समझ सकते हैं वे कि
किस तरह बर्फबारी के सन्‍नाटे
और इतिहास के बियाबां में भी
हमारे संकल्‍पों के शोले दहकते हैं।

(वजीरपुर के गरम रोला कारखाना मज़दूरों को समर्पित, जो पूँजी और सत्‍ता के आतंक-अत्‍याचार तथा भितरघातियों के तमाम षड्यंत्रों और दुष्‍प्रचारों के बावजूद लगातार संघर्षरत हैं)

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