Friday, January 17, 2014


दो छोटी कविताएँ

(एक)
सड़क पर
शर्मसार हो रही हो इंसानियत
पिस रही हो ज़ि‍न्‍दगी
खेतों-कारख़ानों में
सड़कों पर गलियों में बह रहा हो लहू
स्‍त्रीत्‍व को नोंच रहे हों गिद्ध
शैशव नीलाम हो रहा हो बाज़ारों में
ऐश्‍वर्य द्वीपों पर हो रहे हों वैभव विलास
चतुर्दिक गूँज रहे हों रक्‍तपायी प्राणियों के अट्टहास
तब केवल प्रेत कर सकते हैं अकर्मक विमर्श
पुस्‍तकों में डूबी रह सकती हैं बेजान खोपड़ि‍याँ

   
 (दो)

जो बीत गयी
वो घड़ी नहीं फिर आनी।
हारों पर, पीछे हटने पर
रोना कबतक?
पुरखों से अर्जित, गरिमामय
इतिहास-बोध की पूँजी को खोना कबतक?
इन बुद्धिविलासी, अकर्मण्‍य
तिलचट्टों, शंखढपोरों की,
इन लालबुझक्‍कड़ रायबहादुर लोगों की
लटरम-पटरम बातें सुनना
सुन-सुन करके फिर सिर धुनना --
यूँ समय नष्‍ट करना कबतक,
यॅूं बंद कपाटों के पीछे सिर-मुँह ढाँपे
सोना कबतक?
यह समय कठिन है, दुर्निवार
पर इसकी गति को हमें भाँपना होगा
बीहड़ मरुथल लंबे डग भरकर  हमें नापना होगा।
जो बीत गयी
वो घड़ी नहीं फिर आनी
जागेंगे सब
जब गहन घटा घहरानी।

--कविता कृष्‍णपल्‍लवी

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