Thursday, October 22, 2020

मार्क्सवादियों के बीच पोलेमिक्स को लेकर कुछ बातें


राजनीतिक बहस का  एक ईमानदारी भरा तरीका होना चाहिए ! जब आम पर बात चल रही हो तो बहस को अंजाम तक पहुँचाओ I यह नहीं कि आम पर तर्क चुक जाएँ तो बीच ही में अचानक इमली की बात छेड़ दो I फिर कहने लगो कि असली बात तो तरबूज की थी, आम-इमली की तो बहस ही नहीं थी !

दूसरी बात, छापामार शैली युद्ध में अपनाई जाती है ! राजनीतिक संघर्ष एकदम आमने-सामने मुद्दा-दर-मुद्दा होता है I यह नहीं कि जहाँ आप पर हमला हो, वहाँ से आप गायब होकर अचानक कहीं और मोर्चा खोल दें ! या हमला करके फिर निकल लें और  फिर कहीं और मोर्चा खोल दें ! राजनीतिक संघर्ष 'पोजीशननल वारफेयर' होता है I विज्ञान और तर्क को कमान में रखकर होने वाले राजनीतिक संघर्ष में एक-एक नुक्ते का जवाब देना होता है I 

राजनीतिक बहस में यह नहीं होता कि आप कहें कि हम तो आपकी बात का जवाब नहीं देंगे और आप भी हमारी बात पर आलोचना मत कीजिए, क्योंकि हमारी आप से कट्टी है ! और फिर दीवार की ओर मुँह करके आप हमारी बात के ही उत्तर में कुछ कहें और कहें कि हम आपसे बात थोड़े ही कर रहे हैं ! आप दीवार की ओर मुँह करके भी गलत बात कहते हैं तो राजनीति में उसका जवाब देना अनिवार्य हो जाता है !

राजनीति में किसी मुद्दे पर गलत सिद्ध होने के बाद चुप लगा जाना और फिर धीरे-धीरे अपनी पोजीशन बदलते चले जाना परले दर्ज़े का अवसरवाद होता है I 'शिफ्टिंग पोजीशन्स' से बहस करना एक मूर्खतापूर्ण "चतुराई" होती है !

 रेगिस्तान में रेत के ढूह अपनी जगह बदलते रहते हैं ! रेत के ढूहों तले रात में सोने वाले नादान  लोग कई बार उन्हींके नीचे दबकर मोक्ष प्राप्त कर लेते हैं I शिक्षा यह है कि रेत के ढूहों पर कभी भरोसा मत करो !

(22 Oct 2020)

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