Saturday, September 26, 2020

किस्सा कम्युनिस्ट क्रांतिकारी आन्दोलन के एक 'बूढ़-पुरनिया' से मुलाक़ात का !

एक पुराने, अनुभवी साथी हैं, क्रांतिकारी वाम आन्दोलन के 'बूढ़-पुरनिया' हैं ! अक्सर अपनी बात ठिठोली-ठिठोली में या ज़हर बोलकर करते हैं ! जानकारों का कहना है कि जब वह पैदा हुए थे तो रोने की जगह दुनिया पर और आस-पास मौजूद लोगों पर कुछ विष-बुझे शब्द-वाण चलाये थे और लोगों को 'पूत के पाँव पालने में ही दीख' गए थे!

पिछले दिनों मोदी सरकार के तीन कृषि-अध्यादेशों पर जारी किसान आन्दोलन पर 'मज़दूर बिगुल' में एक लेख छपा था, जिसमें सर्वहारावर्गीय नज़रिए से यह सवाल उठाया गया था कि इन तीन अध्यादेशों का विरोध खेत मज़दूर, गरीब किसान, निम्न-मध्यम किसान और शहर के मज़दूर, मेहनतक़श और मध्य वर्ग क्या उन  धनी किसानों, कुलकों, फार्मरों के साथ खड़ा होकर करेंगे, जो गाँव के गरीबों के मुख्य शोषक हैं और जो मुख्यतः लाभकारी मूल्य की गारंटी माँग रहे हैं, जो माँग बहुसंख्यक आम जनता के हितों के ख़िलाफ़ है ? गाँवों के ये पूँजीपति वस्तुतः औद्योगिक-वित्तीय पूँजीपतियों से कुल निचोड़े गए अधिशेष में अपना हिस्सा बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं I मार्क्सवादी तर्क और कृषि में पूँजीवादी विकास के इतिहास से परिचित लोग जानते हैं कि बड़े कारपोरेटों और कुलकों-फार्मरों की लॉबियों के बीच ऐसे संघर्ष होते ही रहते हैं और कभी-कभी बहुत तीखे भी हो जाते हैं ! ये सभी संघर्ष अंततोगत्वा आर्थिक शक्ति के हिसाब से अधिशेष के बँटवारे के समझौते में समाप्त हो जाते है I कुछ धनी किसान बड़े कार्पोरेशनों में जूनियर पार्टनर के रूप में व्यवस्थित हो जाते हैं, कुछ खुद ही मिलकर कारपोरेशन बना लेते हैं और कुछ तबाह हो जाते हैं ! बड़ी पूँजी-छोटी पूँजी, इजारेदार पूँजी-गैर इजारेदार पूँजी, औद्योगिक पूँजी- कृषि क्षेत्र की पूँजी के बीच ये टकराव पूँजीवाद की सार्विक परिघटना हैं I इस लड़ाई में छोटे पूँजीपति और कुलक-फार्मर अक्सर अपना पक्ष मज़बूत करने के लिए तरह-तरह के लोकरंजक नारे देकर जनता के विभिन्न वर्गों को अपने साथ खड़ा करने की कोशिश करते हैं ! छोटे पूँजीपतियों को तब "राष्ट्रवाद" का अजीर्ण हो जाता है और धनी किसान-कुलक चिल्लाने लगते हैं कि सारी किसानी तबाह हो जायेगी, गाँव के सभी गरीब भूखों मर जायेंगे ! ये कुलक-फार्मर अपने खेतों में खुद ही मज़दूरों की हड्डियाँ निचोड़ते हैं और छोटे किसानों को अपनी पूँजी की ताक़त से उजाड़कर सर्वहारा की कतारों में धकेलते रहते हैं ! कारपोरेटों के आने से सिर्फ़ यही होगा कि उजड़ने की वह प्रक्रिया तेज़ हो जायेगी, लेकिन इतना तय है कि पूँजीवाद के रहते छोटी किसानी की तबाही, ग्रामीण आबादी के ध्रुवीकरण और छोटे किसानों के सर्वहाराकरण को कोई नहीं रोक सकता ! फासिस्ट मोदी के घोर जन विरोधी अध्यादेशों के विरुद्ध आम जनता की लामबंदी उन्हीं मुद्दों पर कदापि नहीं हो सकती जो बड़े मालिक किसानों के आन्दोलन के नेता दे रहे हैं ! उक्त लेख में यही स्पष्ट करने की कोशिश की गयी है कि लाभकारी मूल्य जैसे प्रश्न पर केन्द्रित धनी किसानों के इस "किसान आन्दोलन" में भागीदारी की जगह क्रांतिकारी वाम की कोशिश यह होनी चाहिए कि वह गाँव के गरीबों और शहर के आम नागरिकों को उनके वर्ग-हितों की नुमाइंदगी करने वाले नारों और मुद्दों पर संगठित करे, न कि उन्हें "किसान-किसान" चिल्लाते हुए शोषक-शोषित का भेद मिटाकर धनी किसानों का पुछल्ला बना दिया जाए ! जो कम्युनिस्ट किसान आबादी के विभेदीकरण और गाँवों के बड़े किसानों के शोषक चरित्र को न समझने की जिद पर अड़े रहते हैं, वे जाने-अनजाने खुद ही धनी किसानों की पूँछ में कंघी करने लगते हैं और गाँव के गरीबों को उनके जूँए निकालने और चम्पी करने के काम में लगा देते हैं !  लेख में स्पष्ट किया गया है कि गाँव के गरीब और निम्न-मध्यम किसान और खेत मज़दूर तथा शहरी आम जनता के विभिन्न वर्गों को फासिस्ट सरकार के उक्त तीन अध्यादेशों का विरोध किन मुद्दों पर करना चाहिए !

हाँ, तो अब हम कल वाली घटना पर आते हैं ! कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी आन्दोलन के वो विषमुखी 'बूढ़-पुरनिया' राह चलते टकरा गए ! हम तो पहले से ही जानते थे कि कुछ दिनों तक कृषि में पूँजीवाद की बात करने के बाद ये बुज़ुर्ग अब फिर नरोदवाद की सुविधाजनक आरामदेह डाल पर जा लटके हैं ! पर वे हमारी पूरी बात का जवाब देने की जगह पुरखों से प्राप्त अपने तरकस से कुछ भोथरी नोंक वाले विष-बुझे तीर ही छोड़ेंगे ! बहस में कभी नहीं उतरेंगे ! बहरहाल, मिलने पर छूटते ही वह बोले,"जब जनता सड़कों पर हो तो किताबों को ओढ़ने-बिछाने और घोखने का काम नहीं करते !"

मैंने 'बूढ़-पुरनिया' का पूरा सम्मान करते हुए कहा," मुआफ़ करें कामरेड ! सिर्फ़ अगर इतना ही कहेंगे आप तो यह बेहद 'चीप' किस्म की लोकरंजक बात होगी I जनता तो अन्ना आन्दोलन और जाटों-गुज्जरों के आरक्षण आन्दोलन में भी सड़कों पर थी ! कई बार "भीड़" को जनता समझ लेने की जगह उसका वर्ग-विश्लेषण करना पड़ता है ! दूसरे, यह सच है कि कई बार जनता लोकरंजक नारों के भ्रामक बहाव में आकर, और वैकल्पिक क्रांतिकारी नेतृत्व की कमजोरी या मूर्खता के चलते भी, ऐसे प्रतिक्रियावादी आन्दोलनों में उमड़ पड़ती है, जो शत्रु वर्गों की आपसी लड़ाई में किसी एक पक्ष के आन्दोलन होते हैं, या यहाँतक कि धुर-प्रतिक्रियावादी फासिस्ट आन्दोलन होते हैं ! आप इतिहास के पंडित आदमी हैं, आपको दुनिया के इतिहास से ऐसे उदाहरण मैं नौसीखिया भला किस मुँह से गिनाऊँ ? आपको भला यह बताने की हिमाक़त मैं कैसे करूँ कि ऐसे दौरों में सच्चे क्रांतिकारियों का अल्पमत धारा के विरुद्ध खड़ा होकर क्रांतिकारी प्रचार और उद्वेलन का अपना काम चलाता रहा है I अकेले रूसी क्रान्ति के इतिहास में लेनिन और बोल्शेविकों ने ऐसा कई बार किया था ! और आप शायद भूल गए हैं कि कम्युनिस्ट जनता के हिरावल होते हैं, पूँछ नहीं होते !"

फिर मैंने कामरेड से कहा," कामरेड, हमलोग इस विषय पर सिर्फ़ 'बिगुल' में एक लेख लिखकर हाथ पर हाथ धरे बैठे तो हैं नहीं ! आपतो फेसबुक पर लगातार भिड़े रहते हैं ! हमलोग तो, जितनी भी हमारी ताक़त है, उसके हिसाब से देश के कई राज्यों में गाँवों-शहरों में प्रचार और गरीबों की लामबंदी का काम कर रहे हैं I सिर्फ़ किताबों का तकिया लगाकर बैठे तो नहीं हैं ! पर आपकी लाइन तो 'हाहाकार मचाकर इस "किसान आन्दोलन" में झम्म से कूद पड़ने' की है ! फिर आप क्यों चुप लगाए बैठे हैं ? अगर आपकी लाइन धनी किसानों की पूँछ में कंघी करने की है, तो आप यह कहकर तो नहीं बच सकते कि मेरी कंघी टूटी हुई है ! पूँछ में कंघी तो आपको करनी ही चाहिए, चाहे टूटी हुई कंघी से ही सही !"

(26 Sep 2020)


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ये कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी आन्दोलन के जो 'बूढ़-पुरनिया' हैं, इनकी बुद्धि इसक़दर सठिया गयी है कि सोचने और तर्क करने की क्षमता में फफूंदी लग गयी है और दिमाग़ पुराने घंटाघर की रुकी पड़ी घड़ी की सुई की तरह बस एक ही जगह लटका हुआ है ।

अभी कहीं जाते हुए फिर दीख गये । चौपाल में बैठे एक झक्की पत्रकार को अपनी लाइन समझा रहे थे । मुझे देखते ही खैनी ज़ोर से ठोककर निचले होंठ तले दबाई, पगड़ी उतार कर अपनी गुद्दी खुजाई और ऊँची आवाज़ में मुझे सुनाते  हुए ताल ठोककर बोले,"जो इस आंदोलन में किसानों के साथ नहीं है, वह कारपोरेट घरानों के साथ हैं, क्योंकि दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है और लड़ाई में जो आपके साथ नहीं है वह आपके दुश्मन के साथ है ।"

मुझसे रहा नहीं गया । मैंने पास जाकर 'दाल-भात में मूसलचंद' बनते हुए कहा,"प्यारे बुढ़ऊ मसखरे कामरेड! मति मारी जाने से आप भकचोन्हर हो गये हैं ।  आपके भेजे में यह बात घुस ही नहीं रही है कि सिर्फ किसान कहने का आज कोई मतलब नहीं है ! धनी किसान-कुलक-फार्मर जनता के सभी वर्गों के शत्रु हैं और वे लाभकारी मूल्य के लिए औद्योगिक पूँजीपतियों से मोल-तोल की लड़ाई लड़ रहे हैं । किसान आबादी के विभेदीकरण के बाद थनी किसानों के साथ गरीब और निचले-मंझोले किसानों की ऐसी कोई साझा लड़ाई संभव नहीं । याद है कभी आप भी किसान आबादी के विभेदीकरण की बात किया करते थे, राजनीतिक स्मृति-भ्रंश से पहले । अरे महराज, गाँव के ग़रीब और निम्न मध्यम किसानों के कारपोरेट घरानों से लड़ने का एजेंडा अलग है और यह लड़ाई वह शहरी गरीबों के साथ मिलकर लड़ेगा । साथ ही वह ग्रामीण पूँजीपति यानी कुलकों-फार्मरों से भी लड़ेगा । आप दो-दो लाइन की जुमलेबाजी करने और गाँवों के चतुर सयानों की तरह सूक्तियाँ बोलकर फतवे देने की जगह हमारे लेख के सभी तर्कों पर बात क्यों नहीं करते ? वैज्ञानिक बहस में पतली गली से निकल लेने का काम नहीं करते, आमने-सामने दो-दो हाथ करते हैं !"

इसपर  हमारे 'बूढ़़-पुरनिया' मुझिक कामरेड दूसरी ओर मुँह घुमाकर बोले,"हम तुमसे कोई बात नहीं करते ! जाओ! हमारी तुमसे कट्टी !"


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