याद रखना और भूलना -- रचने के लिए दोनों ज़रूरी हैं ! पर यह चुनाव हम शायद ही कभी सही कर पाते हैं कि क्या भूलें क्या याद करें !
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ज़िन्दगी में बहुत अधिक सिनेमा होना चाहिए -- बहुत सारे रहस्य, दृश्यात्मकता, पार्श्व-संगीत, आश्चर्य, विषण्णताएँ, स्वप्न, एक दृश्य में से खुलता दूसरा दृश्य ... I इसतरह शायद ज़िंदगी में कुछ कविता पैदा की जा सके, या शायद कुछ कविता खोजी जा सके !
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भीड़ की तमाम बुराइयाँ हमें भद्र नागरिकों में भी दीख जाती हैं I
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नयी सदी में लगातार लोग बूढ़े पैदा हो रहे हैं I जो वास्तव में नया है, या जिसमें नयेपन की संभावना है; उसे वे झेल नहीं पाते I वे स्मृतियों को स्वप्न समझते हैं और कृत्रिम मेधा और मशीनों के साथ जीते हुए प्यार करने के बारे में ऊदबिलावों की तरह सोचते हैं I
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कवि अपने विचारों की अस्तव्यस्तता, बौनी महत्वाकांक्षाओं और गृहस्थी की उलझनों में मर रहे हैं, लेकिन कविताएँ फिर भी लिखे चले जा रहे हैं !
(18जुलाई, 2019)
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सितारों की ओर देखने पर अँधेरे और अकेलेपन का भय समाप्त हो जाता है I
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सभी अमर प्रेमियों के बारे में सबकुछ जानने के बाद भी प्यार तो हर प्रेमी ( या प्रेमिका ) अपने ढंग से ही करता है I प्रेम एक ऐसी चीज़ है जिसका हर प्रेम करने वाला अपने ढंग से आविष्कार करता है I विद्रोहों और जन-क्रांतियों के बारे में भी शायद यही बात लागू होती है I मार्क्स सही थे -- त्रासदी को दुहराने की हर कोशिश सिर्फ़ और सिर्फ़, प्रहसन ही हो सकती है I महानों के बारे में पढ़-जानकर महान बनने का सपना पालने वाले बौने विदूषक ही हो सकते हैं I
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भाष्यकार रचना का सुन्दर-सटीक भाष्य करता है और रहस्यों को अनावृत्त करता है I रचनाकार चीज़ों को उनकी पूरी रहस्यात्मकता के साथ ही देखता है I जिसका रहस्य खुल चुका हो, वह कलात्मक पुनर्सृजन के लिए किसी काम का नहीं रह जाता I नेरूदा अपने एक सौनेट में प्रेयसी को यूँ प्यार करने की बात करते हैं जैसे अँधेरी चीज़ों को किया जाता है, गुप्त ढंग से, छाया और आत्मा के बीच I
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जब आप प्यार करते हैं, या दिल की गहराइयों से विद्रोह के बारे में सोचते हैं तो आपकी आत्मा पर पड़े दाग़-धब्बे नीम-अँधेरे से बाहर आ जाते हैं और आपकी आँखों के सामने चमकने लगते हैं I इससे आपके भीतर की मनुष्यता भी एक नयी चमक हासिल करती है I
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सफलताएँ और मान्यताएँ अक्सर हमें अपनी क्षुद्रताओं और स्वार्थ को देखने से रोकती हैं I अक्सर हम आत्मधर्माभिमानी और अहम्मन्य हो जाते हैं ! यह मखमली घास की ढलान पर आँख मूँदकर लुढ़कने के समान होता है, जिसका अंत एक गन्दगी भरे दलदल में होता है I
(18जुलाई, 2019)
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भाषाशास्त्रियों के पास गद्य की बहुत शुद्ध भाषा थी, अलौकिक आभा से भरी हुई ! उसमें अब प्रेम और विद्रोह की बातें संभव नहीं रह गयी थीं ! ज्यादा से ज्यादा कुछ आवेदन और निवेदन किये जा सकते थे और कुछ अर्ज़ियाँ लिखी जा सकती थीं I कथाएँ भी कुछ इकहरी और सपाट सी ही कही जा सकती थीं, जैसी ज़माने से कही जाती रही हैं I
फिर मैंने संगीत और रंगों के माध्यम से संवाद की कोशिश की, पर वहाँ भी कुछ रूढ़ियों की दीवारें थीं और कुछ अपनी अक्षमता !
तब मैंने कविता से अपना साथ देने का आग्रह किया I कविता मेरे बागीचे में पतझड़ के दिनों में आयी, धूल-गर्द में सनी हुई, झोले में छेनी और हथौड़ा, कुछ और औज़ार और कुछ रोज़मर्रा की ज़रूरत की चीज़ें लिए हुए, न जाने कहाँ-कहाँ से होते हुए I किसी भाषा में संवाद किये बिना उसने मेरे दुखों और स्वप्नों को समझा, मेरी आत्मा के दाग़-धब्बों की पड़ताल की और भाषा की अलौकिक शुद्धता को छेनी-हथौड़े से तोड़-तोड़करआँसुओं से लेकर पिघले हुए धातु तक, हर तरह की तरलता के प्रवाह के लिए राह बनाने लगी !
(19जुलाई, 2019)
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मुझे किसी के जूते, ओवरकोट, छड़ी, छाता और टोपी नहीं चाहिए I आप महापुरुष हैं तो अपनी इन चीज़ों को किसी संग्रहालय को दे दें I मुझे विदूषक बनकर सड़क पर स्वाँग नहीं करना !
मुझे अपनी भूमिका अपने ही वेश में निभानी है और मंच पर अपने ही संवाद बोलने हैं, हकलाते हुए और अशुद्ध उच्चारण के साथ I
अनुकरण मुझे स्वीकार नहीं I महाजन जिस पथ पर चले, उसपर मुझे नहीं चलना I
मुझे अपनी पढ़ी किताबों और ज़िंदगी के तज़ुर्बात के बारे में बताइये I उनसे सीखकर मैं अपनी राह निकाल लूँगी और अपने हमखयाल, हमसफ़र ढूँढ़ लूँगी !
(19जुलाई, 2019)
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