कुपोषण, भुखमरी, उत्पीड़न, शोषण बढ़ाने के नित नए ईजाद होते तरीकों,असमय मौतों, हत्याओं, युद्धों, बेशुमार भ्रष्टाचार, अनंत-अछोर पीड़ा-यातना के सागर में जगमगाते कुछ समृद्धि-द्वीपों, भीषण विचारहीनता और स्वप्नहीनता तथा फ़ासिस्ट उभारों-उपद्रवों के इस अँधेरे समय में स्थितप्रज्ञ संतमुद्रा धारण किये जो लोग शान्ति से जीने का उपदेश देते रहते हैं, जो लीला-पुरुष साहित्य में क्रीड़ा-कल्लोल करते हैं, कुचों-नितम्बों-नाभियों-जंघाओं आदि-आदि के नवरीतिकालीन डबरे में डुबकियाँ लगाते रहते हैं और साहित्य को "राजनीति-मुक्त" करके उसे अलौकिक सौन्दर्य से भर देना चाहते हैं, जो सिद्धांतकार सत्ता के विचार-केन्द्रों और एन.जी.ओ. में बैठकर बेहतर ढंग से शासन चलाने के तरीकों पर और सुधार की पैबंदसाज़ियों पर चिंतन करते रहते हैं, थीसिसें और रिपोर्टें लिखते रहते हैं -- ये सभी छंटे हुए बदमाश हैं, सबसे ख़तरनाक, नीच, कमीने और हरामी लोग हैं I
आधुनिक काल में पूँजी और हथियारों के साथ ही इन संतवेशी लोगों, लीलापुरुषों और भाड़े के चिंतकों की बदौलत भी बर्बरताओं का साम्राज्य-विस्तार होता रहता है, भविष्य-स्वप्नों की मौतें होती रहती हैं और मनुष्यता का निरंतर क्षरण-विघटन होता रहता है I ये सत्तासेवी संतवेशी लोग, ये कामोन्मादी साहित्यिक लीला-पुरुष और ये पाँच-सितारा विलासी चिन्तक-गण लोगों की रीढ़ की हड्डी निकाल लेते हैं और आत्माओं को कायरता, समझौतापरस्ती, बेरहमी और स्वार्थपरता से लबरेज कर देते हैं I
जहाँ प्रतिदिन, अनवरत, मृत्यु और यातनाओं और अमानवीयताओं की बारिश हो रही हो, वहाँ लोगों को कंधे झुकाए उसमें भीगते रहने की नसीहत देने वाले, अर्ज़ियाँ लिखाकर मिन्नतें-शिकायतें करने, कला-साहित्य की दुनिया में बीमार ऐंद्रिकता को शरण्य बनाने तथा शांति के साथ जीने और धीरज के साथ इंतज़ार करने की सलाह देने वाले सभी किस्म के विद्वज्जन ऐसे ठग और बटमार हैं जो आपकी न्यायशीलता, सामाजिकता, मनुष्यता, सपने देखने की क्षमता और अन्याय के विरुद्ध लड़ने की संकल्प-शक्ति को कब चुराकर चम्पत हो जाते हैं, यह आपको पता ही नहीं चलता ! जिसमें भी कुछ सोचने-विचारने की क्षमता है, उसे ये अपने जैसा ही मनुष्य-वेशी 'जोम्बी' बनाकर सत्ता की सेवा में सन्नद्ध कर देना चाहते हैं !
ये पेशेवर हत्यारों से भी अधिक ख़तरनाक लोग होते हैं I आधुनिक सत्ताएँ मात्र अपने दमन-तंत्र के बूते टिकी ही नहीं रह सकतीं, अगर लोगों के दिमाग़ और संवेदनाओं पर बेहद ख़तरनाक ढंग से, एकदम 'क्लीनिकल प्रिसीजन' के साथ हमला बोलने वाली ऐसी बौद्धिक जमातें उसके साथ न हों I
(16 दिसम्बर, 2018)

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