
मेरा बचपन शहर गोरखपुर में गुजरा I वहाँ नरम साम्प्रदायिकता की लहर उससमय भी हुआ करती थी जब जनसंघ के दो दीये टिमटिमाया करते थे I हिन्दू महासभा के टिकट पर गोरखनाथ मंदिर के महंत दिग्विजयनाथ सांसद चुने जाते थे I उन्हींके वारिस हुए अवैद्यनाथ और फिर उनके वारिस हुए योगी आदित्यनाथ I यह मेरी पैदाइश के काफी पहले की बात है, शायद '70 के दशक के शुरू की या '60 के दशक के अंत की, जब शहर के तीन मुहल्लों का नाम बदलकर उनका हिन्दूकरण कर दिया गया --- अलीनगर का आर्यनगर, उर्दूबाज़ार का हिन्दी बाज़ार और मियाँबाज़ार का मायाबाज़ार I इतने बरसों बाद भी ये बदले हुए नाम लोगों की जुबान पर नहीं चढ़े I लोग उन मुहल्लों को पुराने नामों से ही जानते हैं I नाम बदलने से लोगों की स्मृतियों में रची-बसी वे पहचानें नहीं बदला करतीं जो पुराने नामों से जुड़ी होती हैं I मगर ये बातें वे भला कैसे समझ सकते हैं जो दिमाग से पैदल होते हैं, या यूँ कहें कि जिनके भेजे में धार्मिक कट्टरपन का भुस और फासिज्म की टट्टी भरी होती है I
(9सितम्बर,2018)
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