Thursday, December 21, 2017


शुरू से ही किसी कम्युनिस्ट से शुद्ध-बुद्ध होने,या जीवनपर्यंत बने रहने की उम्मीद करना भी एक किस्म का भाववाद ही है। पार्टी और बुर्जुआ समाज निरंतर एक-दूसरे से संघात-रत रहते हैं और इस प्रक्रिया में पार्टी यदि समाज को प्रभावित करती है तो समाज भी पार्टी को प्रभावित करता है। पार्टी कुछ लोगों को कम्युनिस्ट बनाती है तो समाज पार्टी के कुछ लोगों में बुर्जुआ सोच का विचलन पैदा करता है। इसी संक्रामक बीमारी से निपटने के लिए लेनिन, स्तालिन और माओ ने कम्युनिस्ट पार्टी में हर कुछ समय के बाद दोष-निवारण और छंटनी की मुहिम चलाने की बात की थी।
समाजवाद आने के बाद भी लम्बे समय तक पार्टी के भीतर से 'पूंजीवादी पथगामी' पैदा होते रहेंगे जैसाकि सोवियत संघ और चीन में हुआ था। इसीलिये माओ ने समाजवाद के अंतर्गत पार्टी और राज्य सहित सभी अधिरचनाओं में सर्वहारा अधिनायकत्व के अंतर्गत सतत वर्ग-संघर्ष चलाने की बात कही थी। 
सांस्कृतिक क्रांति के दौरान तीन नारे ऐसे दिए गए थे जो हर-हमेशा किसी भी कम्युनिस्ट संगठन के भीतर बुर्जुआ विजातीय प्रवृत्तियों से लड़ने के सन्दर्भ में अत्यधिक प्रासंगिक हैं।  ये नारे थे : " 'स्व' के विरुद्ध संघर्ष करो", " हमेशा 'लाइमलाइट' में रहने की मानसिकता का विरोध करो", और "नेता बनने के लिए पार्टी में भरती होने की मानसिकता का विरोध करो "। कार्यकर्ता इन विजातीय प्रवृत्तियों के विरुद्ध साहस और सजगता के साथ संघर्ष कर सकें, इसके लिए माओवादी पक्ष से यह भी नारा दिया गया था कि नेतृत्व द्वारा कतारों को "दब्बू औजार" ( डोसाइल टूल ) बनाने की प्रवृत्ति का विरोध करो।

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