Wednesday, May 24, 2017

कविता में नवरीतिवाद का प्रेत भगाने के लिए सदाचार का ताबीज





कल फेसबुक पर सुशील कुमार की एक कविता पढ़ी , जिसकी कई कवियों-आलोचकों ने यह कहकर प्रशंसा की है कि यह अशोक वाजपेयी जैसों की जुगुप्सा पैदा करने वाली देहभोगवादी कविताओं से एकदम अलग भावभूमि पर यौन-प्रतीकों का भाष्य प्रस्तुत करती हैं । पहले उस कविता को पढ़ें, फिर उसपर कुछ विचार किया जाए । वह कविता है:
स्त्री देह का भाष्य 【कविता】
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एक जवान स्त्री की गदराई देह देखता हूँ
तो क्या देखता हूँ ?
उसके उरोजों के उभार
उसकी सुराही कमर के नीचे
जंघाओं के भूगोल का क्या भाष्य है तुम्हारे पास ?
मैं कोई गजल लिखने की हिमाक़त नहीं कर सकता
उसकी रक्ताभ आंखों और घने लंबे केश पर !
नतमस्तक हूँ इस रचना पर
जिसकी स्तनों में
धरती पर आने वाले शिशु के लिए
दूध के झरने बहने की तैयारी है ,
कमर के नीचे वह गर्भगृह ही
उसका सबसे सुरक्षित, निरापद घर होगा
जिससे नालनाभिबद्ध हो
मैं भी नौ मास रहकर वहाँ से
जीवन पाकर लौटा हूँ
इस दुनिया में !
मेरा जन्मस्थल वह ,मेरा सबसे बड़ा तीर्थ वह
वह मेरी समूची पृथ्वी !
***
यानी एक स्वस्थमानस, उदात्त विचारों वाला संवेदनशील पुरुष जब एक युवा स्त्री की "गदराई हुई" देह देखता है तो उसके दिल में यह विचार आता है कि इन स्तनों से, पैदा होने वाले शिशु के लिए दूध झरने वाला है और इसी कमर के नीचे जो गर्भगृह है ,वहाँ मैंने भी नौ महीने निवास किया है और इसलिए वह दुनिया का सबसे बड़ा तीर्थ है , मेरी समूची पृथ्वी है ! लेकिन जब ऐसा "कविहृदय" पुरुष सभी युवा स्त्रियॉं को देखकर ऐसा ही सोचता होगा तो अपनी प्रेमिका या पत्नी के साथ रोमैंटिक/सेक्सुअल प्यार कैसे कर पाता होगा ?-- यह बात कुछ समझ नहीं आती ।
मैं विनम्रतापूर्वक कहना चाहती हूँ कि यह ओढ़ी हुई नैतिकता वाली बनावटी कविता है । हर स्त्री को पुरुष अपनी माँ के रूप में देख ही कैसे सकता है ? और जब वह उसे अपनी माँ के रूप में देखेगा तो "जवान स्त्री की गदराई हुई देह", "उरोजों के उभार", "सुराही कमर", "जंघाओं के भूगोल", आदि-आदि शब्द और बिम्ब उसके दिमाग में आएंगे ही नहीं । इन अभिव्यक्तियों के साथ यदि किसी के दिमाग में स्त्री की मातृ-छवि उभरती है तो यह तो इडिपस-ग्रंथि की ही एक उलट-बिम्बात्मक अभिव्यक्ति होगी ।
स्त्री को सम्मान देने का एकमात्र मतलब यही हो सकता है कि उसे अपनी माँ (या माँ-बहन) मानो, यह पाखंडी हिन्दू नैतिकता हमें वही हिन्दू धर्म-ग्रंथ बताते हैं जिनमें स्त्रियॉं के प्रति देवताओं और ऋषियों के दुराचार-व्यभिचार के आख्यान भरे पड़े हैं । सरस्वती शिशु मंदिरों और संघ की शाखाओं में लगातार ऐसी हिन्दू नैतिकता का पाठ पढ़ाया जाता है और साथ ही स्त्रियॉं को शासित समझना, उनसे नफरत करना भी सिखाया जाता है । ये दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं । फासिस्ट धार्मिक कट्टरपंथी यह बताते हैं कि चूंकि स्त्रियाँ "घर की इज्ज़त" होती हैं अतः "विधर्मी शत्रुओं" को पराभूत करने के लिए उनकी स्त्रियों को शिकार बनाना सबसे उपयुक्त उपाय होता है ।
एक स्त्री को पत्नी, जीवन-साथी या प्रेमिका के रूप में, या सिर्फ एक दोस्त के रूप में देखना भी उतना ही स्वाभाविक है, जितना कि एक माँ के रूप में देखना । अब सड़क चलती एक आम स्त्री की बात है, तो हम उसमें एक माँ, प्रेमिका या पत्नी की छवि देखें ही क्यों ? क्या इनसे इतर स्त्री और कुछ नहीं ? अधिकांश कविताओं में स्त्रियाँ इसी रूप में आती है मानो मर्दों से प्रेम करना, उनकी "सौन्दर्य-पिपासा" को तृप्त करना और जैविक पुनरुत्पादन करना-- यही औरत के कुल काम हैं या मुख्य काम हैं । यह पुराने मर्दवाद का ही एक संशोधित-परिष्कृत संस्करण है । सामान्य तौर पर स्त्री को अलग जेंडर वाली एक समान नागरिक और विचारशील प्राणी के रूप में देखने की आदत अभी भारत के "प्रगतिशीलों" को भी कम ही पड़ी है । एक परत उतारो तो अंदर से घूरता-गुर्राता एक मुच्छड़ मर्द निकल आता है और फिर कहता है, "माताजी, प्रणाम!"
अगला बिन्दु यह है कि एक स्वस्थ पुरुष दृष्टि से भी स्त्री-सौन्दर्य का वैसे ही सामान्यतः वर्णन किया जा सकता है जैसे प्रकृति के या पुरुष के या किसी भी सौंदर्यात्मक उपादान के सौन्दर्य का । उन्नीसवीं शताब्दी की रोमैंटिक कविता से लेकर लोर्का और नेरूदा तक और हमारे यहाँ शमशेर तक--इसके अनगिन उदाहरण मिलेंगे । निराला ने तो 'सरोज-स्मृति' में बड़ी होती बेटी के यौवन का वर्णन किया है और वह इतना स्वस्थ और उदात्त है कि क्लासिक है । स्त्री-सौन्दर्य का वर्णन अपने-आप में अश्लील या जुगुप्सित नहीं हो सकता, अश्लीलता और जुगुप्सा वहाँ से पैदा होती है, जब स्त्री और उसके सौन्दर्य का वस्तुकरण किया जाता है , या पण्यकरण किया जाता है। मार्क्सवादी सौंदर्यशास्त्र भी 'वल्गर','सेन्सुअस', और 'इरोटिक' में फर्क करता है । यह एक विस्तृत विमर्श का विषय है, पर इतना इंगित कर देना यहाँ ज़रूरी है कि पुनर्जागरणकाल के दौरान , और फिर उन्नीसवीं शताब्दी में कूर्बें, माने, मोनेट आदि यथार्थवादी और अभिव्यंजनावादी चित्रकारों ने, और फिर सोवियत चित्रकारों ने स्त्रियों के जो निर्वसन चित्र बनाए, वे अपने-अपने समय में वैचारिक-सौंदर्यात्मक अंतर्वस्तु की दृष्टि से क्रांतिकारी और प्रगतिशील थे । उन चित्रों को यदि कोई आज के पॉर्न के समकक्ष देखे तो यह उसकी मनोरुग्णता और कला से दुश्मनी का ही प्रमाण होगा । यानी स्त्री-सौन्दर्य के शाब्दिक या छविगत चित्रण को अपने आप में कुत्सित- जुगुप्सित नहीं घोषित किया जा सकता और इसे उदात्तता का पैमाना नहीं बनाया जा सकता कि यदि एक सुंदर युवा स्त्री को भी देखो तो उसमें मातृ-छवि देखो, नहीं तो तुम गंदे हो ! यदि तुम उसे पा लेने, भोगने और उसके साथ सोने की कामनाओं-कल्पनाओं-फंतासियों में नहीं चले जाते हो तो अपनी स्वस्थ सौंदर्याभिरुचि से भी उसके सौन्दर्य को सराह सकते हो । तुरत उसमें अपनी माताजी की छवि ढूँढना कोई नैतिक उपक्रम नहीं बल्कि मर्दवादी अपराध-बोध की कोई गांठ है । अशोक वाजपेयी जैसे कवि स्त्री-देह का वर्णन एक भोग्या की छवि के रूप में करते हैं, वे स्त्री और उसकी देह का वस्तुकरण करके यौनरस पैदा कराते हैं, यह नव-रीतिवाद है । अभी कुछ वर्षों पहले स्त्री के स्तनों पर पवन करण जैसे प्रगतिशील कवि और अनामिका जैसी नारीवादी कवयित्री ने बेहद कुत्सित-जुगुप्सित कवितायें लिखी थी और 'कथादेश' पत्रिका में लेख लिखकर शालिनी माथुर ने उनकी अच्छी खबर ली थी । लेकिन इसका दूसरा छोर यदि यहाँ जाता है कि 'हर स्त्री में मातृ-छवि देखो', तो इस सात्विकता के पीछे भी पुरुषवादी अपराधबोध की एक ग्रंथि ही सक्रिय है । यह भी एक स्त्री-छवि का विरूपण और वस्तुकरण ही है कि स्त्री को देखते ही मातृत्व की छवि उभरे, गोया माँ से अलग स्त्री कुछ होती ही नहीं । स्त्रियों को भी तो लगातार यही शिक्षा दी जाती है कि मातृत्व ही उनके लिए परम-लक्ष्य की प्राप्ति है ।
पिछड़े समाजों में नैतिकता और सामाजिक आचार की जो धार्मिक-कूपमंडूकीय और पाखंडपूर्ण मान्यताएँ और धारणाएं सदाचार और शालीनता के रूप में स्थापित रहती है वे स्पष्ट विश्व-दृष्टिकोण के अभाव में कई बार रिसकर प्रगतिशील कवियों-लेखकों के दिमागों में भी प्रविष्ट हो जाती हैं । मार्क्सवाद प्यार और सौन्दर्य की भौतिकवादी अवधारणाओं की बात करता है और उनकी अकुंठ, बेलागलपेट अभिव्यक्ति में यकीन करता है । मार्क्स और एंगेल्स के जीवन काल के तीन महान सर्वहारा कवि थे -- हाइनरिख हाइने, गेओर्ग वेयेर्त और फर्डिनांड फ्रेलिगराथ । इनमें से वेयेर्त की विशिष्टता बताते हुए एंगेल्स ने जो लिखा है, वह इस प्रसंग से सीधे न जुडते हुए भी साहित्य के विवरणों में श्लीलता-अश्लीलता आदि प्रश्नों पर मार्क्सवादी नज़रिये को काफी हद तक स्पष्ट कर देता है :
"...जिस चीज़ में वेयेर्त आचार्य हैं, जिसमें वह हाइने से ऊपर थे ( क्योंकि वे अधिक स्वस्थ तथा सच्चे थे ) और जर्मन साहित्य में जिनका स्थान केवल गोएठे के एकदम बाद आता है, वह है स्वाभाविक, स्वस्थ विषय-भोग तथा दैहिक वासना की अभिव्यक्ति । 'A Social Demokrat' के बहुत से पाठक सहमे रह जाएंगे, अगर 'Neue Rheinische Zeitung' से कुछ व्यंग्य-लेख पुनः मुद्रित कर दूँ परंतु मैं इसकी कल्पना तक नहीं कर सकता । परंतु यह टीका किए बिना नहीं रह सकता कि जर्मन समाजवादियों के लिए वह वक्त आना चाहिए, जब उन्हे इस अंतिम जर्मन कूपमंडूकीय पूर्वाग्रह को खुलेआम एकओर फेंक देना होगा । यह झूठी निम्न-बुर्जुआ लज्जा तो गुप्त अश्लीलता के लिए केवल पर्दे का काम देती है । उदाहरण के लिए, फ्रेलिगराथ की कविताओं को पढ़ते समय सचमुच यह सोचा जा सकता है कि लोगों के पास यौनांग ही नहीं है । परंतु चुपके से कोई मसालेदार चुटकुला सुनाने में किसी और को इतना मज़ा नहीं आता था जितना घोर सतीत्वधर्मी फ्रेलिगराथ को । अंततः समय आ गया है कि कम से कम जर्मन मजदूर इसके बारे में, जो वे स्वयं दिन या रात को करते हैं, प्राकृतिक, अपरिहार्य तथा निरपवाद रूप से आनंद योग्य चीजों के बारे में उतनी ही स्पष्टता के साथ बातें करें, जितनी स्पष्टता के साथ रोमांसभाषी जनगण करते हैं, तथा होमर और अफलातून, होरेस और जुवेनाल, पुरानी इंजील तथा Neue Rheinische Zeitung ने की ।
( फ़्रेडरिक एंगेल्स : " 'शागिर्दों का गीत' गेओर्ग वेयेर्त द्वारा रचित " )

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