Tuesday, May 08, 2018




ग्राम्शी ने कहा था : मनुष्य प्रकृति की नहीं,इतिहास की उपज है | बात बिलकुल ठीक है | हम प्राकृतिक जीव होने से दसियों हज़ार साल आगे निकाल आए हैं |एक सामाजिक प्राणी के रूप में हमारी नियति समाज के साथ जुड़ी हुई है | लेकिन अलगावग्रस्त आत्मकेंद्रित मानस आज भी सामाजिकता से विमुख होकर केवल अपने बारे में और अपने स्वजनों के बारे में सोचता है | एक प्राकृतिक जीव की तरह वह आत्मरक्षा , संतानोत्पत्ति और वंशबेलि को आगे बढ़ाने को ही परमलक्ष्य की प्राप्ति मानता है | बुर्जुआ समाज के पढे- लिखे नागरिक भी एक प्राकृतिक जीव की तरह अपने जैविक पुनरुत्पादन के फ़लितार्थ को लेकर चिंतित रहते हैं | एक स्वस्थ सामाजिक प्राणी के रूप में हमारी सर्वोपरि चिंता सामाजिक सृजनशीलता को लेकर होनी चाहिए, न कि जैविक सृजनशीलता को लेकर | जीवन-संघर्ष के तमाम दुखों-कष्टों से हम सामाजिक-आत्मिक सृजन की ऊर्जा जुटते हैं और पुनर्नवा होते रहते हैं | कालिदास की इस उक्ति को इसी भांति नया अर्थ देना होता है --' क्लेशः फलेन हि पुनर्नवता विद्यते |' यह अमरत्व-प्राप्ति की भी नयी प्रविधि है : वंशबेलि को आगे बढ़ाने की जगह समूची आने वाली पीढ़ी के बारे में सोचना, उसके लिए कुछ करना और उसे एक बेहतर दुनिया सौंप जाने की कोशिश करना !

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