Friday, February 16, 2018



यह आखेट का युग है ।
पूँजी कर रही है मनुष्यता का आखेट ।
संस्कृति-पुरुष कर रहे हैं सृजन का आखेट ।
तर्कणा का आखेट दार्शनिकों के ज़िम्मे है ।
साहित्य-सर्जकों का काम है कला और मानवीय सारतत्व का आखेट ।
उधर प्रेम और स्मृति के जंगलों में जारी है
स्त्री की देह , सपनों और कामनाओं का आखेट ।


28 जुलाई,2017

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