Saturday, February 03, 2018

वामपंथ की चूनर ओढ़े रास रचाते हो सत्ता संग



सरस्वती के आराधक कहलाते हो
लक्ष्मी के वाहन के पीछे सरपट दौड़ लगाते हो

वि प्र तिवारी फोन करें तो भागे-भागे जाते हो
अकादमी में कविता पढ़कर फूले नहीं समाते हो

पुरस्कार, पद-पीठ-प्रतिष्ठा औ' विदेश-यात्रा खातिर
इधर-उधर की दौड़ लगाते हरसू जुगत भिड़ाते हो

प्रगतिशीलता-कलावाद का अद्भुत मेल कराते हो
ऊंची कुर्सी पर बिराजकर आशीर्वचन सुनाते हो

प्रतिरोध की संस्कृति पर तुम भाषण गज़ब सुनाते हो
फासिस्टों के छज्जे पर फिर चढ़कर दिया जलाते हो

यशलोलुप, पाखंडी हो, मौकापरस्त हो, कायर हो
लेकिन यार, मदारी मौलिक, खेला गज़ब दिखाते हो

-- कविता कृष्‍णपल्‍लवी

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