Tuesday, February 27, 2018




एक समय था जब नाराज़ होने पर
मैं बंद कर लेती थी दरवाज़े
और नीम-अँधेरे कमरे में
गुस्से के तेज़ाब में
घुलती-गलती रहती थी I
तमाम-तमाम चीज़ों से
मेरी नाराज़गी बढ़ती ही गयी
और मैं अपने ही चुने अँधेरे में
घुलती-गलती, घुटती रही I
फिर एक बार ऐसा हुआ कि
मैं नाराज़ हुई आँगन में
और गलती से जो दरवाज़ा ठेला
तो बाहर सड़क पर निकल आयी
और बस निरुद्देश्य किसी दिशा में
चलती चली गयी I
बाहर और अधिक गुस्सा दिलाने वाली चीज़ें थीं,
पर रोशनी और हवा भी थी
और बहुत सारे लोग थे
बाज़ार या दफ़्तर जाते हुए,
हड़ताली मज़दूरों का एक जुलूस था,
और बहुत सारे बच्चे,
बूढ़ी और जवान
सकारण उदास और अकारण हँसती-खिलखिलाती स्त्रियाँ,
और पेड़ और आकाश
और जो भी चाहो,
वह कहीं न कहीं था I
हालात ऐसे हैं कि न चाहते हुए भी,
अब भी मैं अक्सर नाराज़ ही रहती हूँ,
पर मैं खुश और उदास भी रहती हूँ
इन्हीं सड़कों पर, इन्हीं
गलियों-मैदानों के खुलेपन में ,
प्यार और दोस्ती और विचार
और सपनों और कामनाओं और
और युद्ध और आशा और निराशा
और लगभग समूची ज़िन्दगी को
यहीं पर डूब-छककर जीती हुई
जैसे एक ही जनम में कई जनम।

--कविता कृष्‍णपल्‍लवी
(26फरवरी,2018)

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