Friday, February 16, 2018





पूंजी की संस्कृति के सर्वग्रासी घटाटोप में हिन्दी कविता छीज रही है । विचारहीनता और अराजकता का घटाटोप है । ढेरों युवा कवि आगे आए हैं पर चार-पाँच को यदि छोड़ दें तो न कहीं परम्पराओं का गंभीर अनुशीलन दीखता है , न वर्तमान को समझने की दृष्टि , न ही भविष्य के संधान का विजन । जीवन में मानवीय सारतत्व का जो विघटन हुआ है ,वही कविता की दुनिया में परावर्तित हो रहा है । कुछ अराजक व्यक्तिगत विद्रोह का परचम लहरा रहे हैं । कुछ चमकते बिंबों की चमत्कारी छटा के साथ धूमकेतु की तरह क्षितिज पर उदित हुए और फिर या तो जड़ीभूत खांचों-साँचों से बंधकर रह गए या फिर कला की बारीक तराश के आग्रह के साथ चौंक-चमत्कार भरे रूपवादी मायाजाल में उलझकर रह गए । कुछ लोग नवाचार करके चर्चित हुए और फिर दुहराव का शिकार हो गए । कुछ लोग लगातार बस बिना चेहरे की कविताएं लिखते रहे । कुछ लोग अश्मीभूत नैतिक-सांस्कृतिक साँचों-खांचों को तोड़ने के नाम पर बुर्जुआ पतनशील अराजकता के शिकार हो गए हैं और स्वयं अपने विघटित व्यक्तित्व की बानगी पेश कर रहे हैं । विपर्यय और गतिरोध का जो ऐतिहासिक दौर हमारे समय की परिवर्तनकामी राजनीति के सामने चुनौती बनकर खड़ा है , वही साहित्य के क्षेत्र में भी संकट का मूलभूत कारण है । इस संकट से निजात तभी पाया जा सकता है जब सुनिश्चित वैज्ञानिक समझ के साथ आज के समय और समाज को समझने की कोशिश की जाए और जनता के जीवन , संघर्षों और स्वप्नों को जनता के बीच जाकर समझा जाए । तभी कविता हमारे समय का बहुवर्णी 'ह्यूमन लैंडस्केप' रच सकती है और तभी वह फ़ासिज़्म के घटाटोप के विरुद्ध जनता के हाथों में हथियार बन सकती है ।
27 जुलाई, 2017

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