Thursday, May 18, 2017





कुछ लोग मार्क्सवाद की समस्याओं पर,वामपंथियों की एकजुटता पर, हमारे समय और समाज के संकटों पर हरदम राय देते रहते हैं और इतने चिंतित दीखते हैं कि लगता है कहीं इनका हार्ट ही न फेल हो जाए | लेकिन इतने ही चिंतित हैं तो कभी-कभी फेसबुक से उठकर समाज में जाकर कुछ करना भी चाहिए दिन-रात फेसबुक पर चिंता जाहिर करने मात्र से क्या होगा साथी ? सुबह 6 बजे से लेकर 12 बजे रात तक तो फेसबुक पर ही बैठे रहते हो, जब भी कोई पोस्ट डालती हूँ तो अपनी चिंताओं के साथ तुरत कमेन्ट-बाक्स में अवतरित हो जाते हो | लगता है कोई नौकरी भी नहीं करते , या तो खानदानी जमा-पूंजी खाते हो या व्यापार वगैरह करते हो और दुकान में बैठे-बैठे पोस्ट-कमेन्ट ठेलते रहते हो | अटकलपच्चू मार्क्सवाद और वामपंथ के बारे में इतना मूर्खतापूर्ण लिखते हो कि कोई अपना सिर पीट ले | मार्क्सवाद का ककहरा न जानने के बावजूद किसी गंभीर विमर्श में कूद पड़ते हो |अरे, थोड़ा समय फेसबुक से पढ़ने के लिए भी निकालो और थोड़ा मार्क्सवाद पढ़ डालो |यूं ही तमाम लिंक मांगते रहते हो, पढ़ते-लिखते कुछ नहीं | और उस समय तो सिर नोचते हुए उछलने-कूदने को जी होने लगता है जब किसी भी बहस में मेरा पक्ष लेकर अत्यंत मूर्खतापूर्ण तर्क देते हुए या प्रसंगान्तर करते हुए टप्प से कूद पड़ते हो | एक और स्त्री कामरेड भी अपने एक ऐसे ही मूर्ख "खैरख्वाह" के बारे में बता रही थी,आनंद आया |अरे भाई ऐसी मित्रताओं का आनन्द लेने वाली लेखिकाएँ-कवयित्रियाँ भरी पड़ी हैं| हम पॉलिटिकल ऐक्टिविस्टों को क्यों सता रहे हो ? और अपना टैम भी तो बस यूं ही खाली-पीली खोटा कर रहे हो !

No comments:

Post a Comment