Friday, April 15, 2016





हम देख सकते हैं कि आज के मनुष्य में क्षुद्र चीज़ों ही का सृजन करने की क्षमता बाकी रही है और उसकी आत्मा की भयंकर निरर्थकता तो और भी द्रष्टव्य है। ऐसी स्थिति में हमें इस बात पर विचार करना चाहिए कि हमारा भविष्य क्या होगा, विचार करना चाहिए कि अतीत हमें क्या सिखा सकता है और उन कारणों को समझना चाहिए जो व्यक्ति को एक दुर्निवार विनाश की ओर खींच रहे हैं।
जैसे-जैसे समय गुज़रता जाता है, ज़ि‍न्दगी और भी कठोर और दुखमय होती जाती है, क्योंकि यहाँ हर व्यक्ति समष्टि से संघर्ष करने में लगा है। अपेक्षा की जा सकती है  कि यह खौलता हुआ वैमनस्य हर व्यक्ति में एक लड़ाकू भावना का उद्रेक करेगा क्योंकि वह यहाँ अपने अन्य जाति-भाइयों के आक्रमणों का मुकाबला करने के लिए विवश दीखता है। किसी व्यक्ति में अगर सृजन की सहज भावना होती है तो हर व्यक्ति का 'सब दूसरों' से अनवरत संघर्ष करने में लगे रहने की स्थिति , उसको दुनिया के आगे अपनी आत्मा की पूरी शक्ति और अपनी काव्य प्रतिभा का पूरा वैभव प्रदर्शित करने का अवसर प्रदान करती है। लेकिन आज के व्यक्ति ने अभी तक एक भी प्रमथुस या विलियम टेल तक की सृष्टि नहीं की और न किसी ऐसे प्रती‍क की परिकल्पना की है, जो शक्ति और सौन्दर्य में प्राचीनतम काल के हरक्युलीज का मुकाबला कर सके।
निस्संदेह मेनफ्रेड जैसे अनेक चरित्रों की सृष्टि की गयी है, जिनमें से हरेक एक ही बात के बारे में विभिन्न ढंगों से बोलता है -- व्यक्ति-जीवन की रहस्यमयता के बारे में, संसार में व्यक्ति के अकेलेपन के त्रास के बारे में जो यदा-कदा इस निखिल ब्रह्माण्ड के बीच हमारी पृथ्वी नीरस अकेलपन पर शोकपूर्ण भावना की ऊँचाई तक उठ जाता है -- इसमें गहरी वेदना का स्वर तो रहता है लेकिन प्रतिभा और जीनियस का छोटा अंश भी नहीं होता। मैनफ्रेड दरअसल प्रमथुस का उन्नीसवीं शताब्दी का विकृत रूप है, बड़ी कलात्मकता से खींचे गये एक फिलिस्टाइन (जाहिल व्यक्तिवादी) की तस्वीर है, हमेशा के लिए जो सिवाय अपने और अपने सामने खड़ी मौत के इस व्यापक जगत में होने वाली किसी अन्य चीज़ के बारे में सोचने या समझने की क्षमता खो बैठा है। वह अगर कभी सारे संसार के लोगों की पीड़ा-यातनाओं  का जिक्र करता भी है, तो दुनिया के लोग इन पीड़ाओं से मुक्ति पाने के लिए जो संघर्ष कर रहे हैं, उसकी ओर ध्यान भी नहीं देता, और अगर यह विचार कभी उसके मन में उठता भी है तो वह सिर्फ इतना ही कह सक‍ता कि दुख-पीड़ाएँ दुर्निवार है। वह इससे ज्यादा कह भी नहीं सकता, क्योंकि जिस आत्‍मा को अकेलेपन के घुन ने खोखला बना दिया है, उसकी दृष्टि सीमित हो जाती है, वह समष्टि की स्वयंभूत क्रियाशीलता को देख ही नहीं सकती और संघर्ष में जीतने का विचार ही उसकी भावना के प्रतिकूल होता है। 'मैं' के लिए, ऐसी स्थिति में पहुँचकर, आनंद का केवल एक ही स्रोत बाकी रह जाता है -- कि वह निरंतर अपनी बीमारी और अपने निकट आती हुई दुर्निवार मृत्यु का रोना रोती रहे; मैनफ्रेड से आरंभ करके यह 'मैं' स्वयं अपना और उसके जैसे अन्य अकेले और क्षुद्र व्यक्तियों का मर्सिया गाती चली आई है।
-- मक्सिम गोर्की
('व्यक्तित्व का विघटन', 1909)

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