Saturday, October 03, 2015

जिनकी जिन्‍दगी में कविता की धड़कनें और थरथराहटें होती हैं, उनकी कविता में जिन्‍दगी की धड़कनें और थरथराहटें महसूस होती हैं।
जो जिन्‍दगी में समाज की सारी भौतिक सम्‍पदा का उत्‍पादन करने वाले शोषित-उत्‍पीड़ि‍त जनों के साथ हैं, उन्‍हीं की कविता में उद्वेग का उत्‍ताप होता है, स्‍मृतियों का आग्रह होता है, स्‍वप्‍नों का सौन्‍दर्य होता है, आह्वान की आग होती है और उम्‍मीदों को ऊष्‍मा होती है। बाकी सब पाखण्‍ड है, क्षणिक कौंध है, ऊपरी रंगरोगन है, दिखावटी जनपक्षधरता का छलछद्म है, कलावाद की 'माया महाठगिनी' है, निरर्थकता की अभ्‍यर्थना है, अकर्मण्‍यता का विमर्श है, पुंसत्‍वहीन भिनभिन-भुनभुन है, और कुछ नहीं, कुछ भी नहीं।

No comments:

Post a Comment