Friday, May 29, 2015

फासिस्‍टों के सफेद दस्‍ताने चढ़े खूनी हाथों को चूमने वाले ''वामपंथी''










राजनीति की तरह साहित्‍य में भी छद्म और वास्‍तविक के बीच विभाजक रेखा खींचे बगैर व्‍यापक वाम एकता का नारा देना फालतू की बकवास है!


-- कविता कृष्‍णपल्‍लवी

प्रसिद्ध उक्ति है कि ब्रह्माण्‍ड की तो एक सीमा है, लेकिन मूर्खता की कोई नहीं। इसमें यह जोड़ देना चाहिए कि अवसरवादी नीचता और केंचुआ-वृत्ति की भी कोई सीमा नहीं होती। कल मराठी उपन्‍यासकार भालचन्‍द्र नेमाड़े को नरेन्‍द्र मोदी के हाथों जब पचासवाँ ज्ञानपीठ पुरस्‍कार दिया गया तो मंच पर ''वामपंथी'' आलोचना के ''शलाका पुरुष'' नामवर सिंह भी मौजूद थे और ज्ञानपीठ की ओर से साहू-जैन घराने के इस कला-दरबार और बिसातखाना में चाकरी करने वाले कवि लीलाधर मण्‍डलोई भी।
नेमाड़े इन दिनों हिन्‍दुत्‍ववादियों के आँखों के तारे हैं, राजदुलारे हैं। उनके लेख और साक्षात्‍कार 'पांचजन्‍य' और 'आर्गनाइज़र' में अक्‍सर छपते रहते हैं। मोदी जी ने हमेशा की तरह ज्ञान के मोती बाँटते हुए इस अवसर पर भी फरमाया कि हज़ारों वर्ष पहले लिखे गये वेदों में 'ग्‍लोबल वार्मिंग' और पर्यावरण संकट जैसी मानवता की समस्‍याओं के समाधान मौजूद हैं। नामवर और मण्‍डलोई ने भी यह ज्ञान ग्रहण किया। मुण्‍डी हिलायी। मोदी ने नामवर का हाथ भी थाम्‍हा। नामवर गदगद हुए।
प्रोफेसरी करके नामवर और दूरदर्शन में अफसरी करके लीलाधर इतनी रकम तो जोड़ ही  चुके हैं कि पूरा बुढ़ापा आराम से कटे। न तो नामवर को (बकौल विष्‍णु खरे) बनियों के घर 'रामू काका' बनने की ज़रूरत थी, न ही पप्‍पू यादव, आनंद मोहन सिंह और आर.एस.एस. विचारक राम माधव की पुस्‍तकों का विमोचन करने और विरुदावली गाने की। लीलाधर भी ज्ञानपीठ की मुलाज़मत रोटी खाने के लिए नहीं कर रहे हैं। खाने और ''पीने'' के लिए उनके पास पर्याप्‍त है। एक और लीलाधर उनके पहले भी हुए हैं, लीलाधर जुगाड़ी, जो पहले भाजपाई मुख्‍यमंत्री नित्‍यानन्‍द स्‍वामी को अपना पिता बताते रहे, फिर कांग्रेसी मुख्‍यमंत्री का प्रिय पात्र बनने के लिए हिमालय में बांध बनाने की नीति की ज़ोर-शोर से पैरवी करने लगे। लीलाधर की लीला सचमुच अपरम्‍पार है। हत्‍यारों के दरबार में हाजिरी बजाने के साथ-साथ प्रगतिशील और जनवादी का चोंगा पहने रहने वाले इन घृणित बहुरूपियों के हमप्‍याला-हमनिवाला छद्म वामपंथियों की भी जात पहचानने की ज़रूरत है। ऐसे भी छद्म वामपंथी हैं जो आज भुनभुनाकर ऐसे लोगों की कुत्सित हरकतों की निन्‍दा करते हैं और फिर कल किसी आयोजन में इन्‍हीं के पहलू में बैठे दाँत चियारते नज़र आते हैं। ऐसे लोगों की मज़बूरी यह है कि साहित्‍य की दुनिया में स्‍थापना और चर्चा के लिए साहित्यिक माफिया गिरोहों से खुली दुश्‍मनी करने और निभाने का जोखिम नहीं मोल ले सकते। हिन्‍दी साहित्‍य के माफिया गिरोहों का तंत्र लातिन अमेरिकी देशों के ड्रग कार्टेलों से भी अधिक ताकतवर और गहरी पैठ वाला है।
राजनीति की ही तरह साहित्‍य में भी वाम जनवादी शक्तियों की एकता की सारी बातें बकवास हैं। सबसे पहले ज़रूरी है छद्म वाम और वास्‍तविक वाम के बीच विभाजक रेखा खींचना। सत्‍ता सेवी, कैरियरवादी गिरगिटों का असली रंग तो पहचानना ही होगा। फासिस्‍टों के सफेद दस्‍ताने चढ़े खूनी हाथों को चूमने वाले गंदे-घिनौने लोगों के साथ किस बात की एकता और किस मक़सद से एकता?

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