Monday, April 13, 2015

प्रस्‍तुत हैं तीन ताज़ा कविताएँ





संस्‍कृति के इस बियाबान में 

ठूँठों के ठीहों पर
बैठे हैं गिद्ध,
कला की अर्थी पर सजे
शवों की प्रतीक्षा करते हुए
सपनों को चीथ रहे हैं
और असह्य सड़ांध से
जीवन को भर रहे हैं।
कोटरों से निकलकर
चमगादड़ अँधेरे आकाश में
दार्शनिक उड़ानें भर रहे हैं।
चतुर सियार मारे गये शिकारों की
आलोचनात्‍मक टोह ले रहे हैं।
कविगण कला की बारीकियों पर
गहन विमर्श कर रहे हैं।
विचारक विचारों की रोटी खा रहे हैं।
भेड़ि‍ये दलाल स्‍ट्रीट की खोह से निकलकर
अयोध्‍या, गुजरात, मुजफ्फरनगर होते हुए
न जाने कहाँ-कहाँ जा रहे हैं।


व्‍यक्तित्‍वांतरण 

मुक्ति की सोच उभरी एक कौंध की तरह
उसने हाथ बढ़ाकर
अँधेरे सीलन भरे गड्ढे से बाहर निकाला।
तमाम-तमाम दु:ख-दर्द-परे‍शानियों के बीच
ऋतुओं ने मुझे पहचाना।
ज़ि‍न्‍दगी ने मुझे बजाया पियानो पर
एक पुरानी लोरी की तरह।
स्‍मृतियों ने थम्‍हायी हाथों में
यात्राओं के लिए आतुर आकांक्षाओं के घोड़ों की रास।
निज के क्षण आते-जाते रहे प्रवासी पंछियों की तरह।
विचार आते रहे कभी वत्‍सल पिता की तरह
तो कभी मुँहफट दोस्‍त की तरह
लम्‍बी दूरियाँ तय करके।
बताया उन्‍होंने कि इस जादुई द्वीप पर
रुकते ही धरती पर उग आता है
एक अँधेरा सीलन भरा गड्ढा
और कभी-कभी तो वह
हमारी आत्‍मा के भीतर तक गहरा होता है।
इसलिए चलते रहने होगा अविराम।
उड़ना होगा कविता के पंखों के सहारे
स्‍वर्ग की ओर
तमाम शापित जनों के साथ।
आग इसबार चुराकर नहीं
छीनकर लानी है।
देवताओं के शाप की शक्ति को वश में करना है
और उन्‍हें देवत्‍व के जघन्‍य अपराध का
दण्‍ड सुनाना है।


कविता-सा जीवन पा लो, जीवन-सी कविता रच लो 

अपना भी जीवन जैसा ही जीवन है।
जीवन और वनस्‍पतियों से
भरा हुआ ज्‍यों वन है।
दु:ख-प्‍यार, मिलना-बिछोह --
जो भी विशुद्ध निज का था
उसको हरदम निजता में ही जिया।
रंगे-बिरंगे थिगलों का यूँ बैठ अकेले
पुरखों से पाई कथरी में सिया।
आतंक भरी बस्‍ती में नहीं सजाया
निज के सपनों, दु:खों-सुखों का बिसातखाना,
वही चबाया हुआ च्‍युइंगम बार-बार क्‍या चुबलाना?
जितना भी बारीक कात लो
जितना भी सुंदर तराश लो
सजी-सजायी अरथी पर लेटी सड़ती
लाशों सी कविताएँ बद‍बू मार रही हैं।
इस विकट समय में दम हो गर जिगरे में
तो लिखो प्रेम की और शोक की भी कविताएँ
नाजिम और नेरुदा जैसी।
हम हैं वहाँ जहाँ दुर्दम जीवन की कविता
हर पल जादू सिरज रही है
लपटों जैसी लहक रही है
ढाक वनों सी दहक रही है
मेरे अन्‍तस्‍तल के भीतर
उमड़-घुमड़ बरस रही है।

-- कविता कृष्‍णपल्‍लवी

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