Wednesday, September 24, 2014

महासागर



लिथुआनिया की कविता



महासागर! ...
उतना ही पुरातन जितनी हमारी यह दुनिया,
जो कविताएँ हैं इसके बारे में वे भी पुरानी हैं,
फिर भी यह लगातार गतिमान है,
अनवरत गतिमान,
और मैं महसूस करता हूँ इसके साँचे में ढले एक टापू की तरह।
मैं मानता हूँ हम दुहराते हैं खुद को, घिसे-पिटे हैं हम,
शायद बचकाने ही हैं सब कुछ के बावजूद,
लेकिन फिर भी क्‍यों न तुलना करें महासागर से मानव जीवन की?
यदि राष्‍ट्र और लोग हैं टापुओं की तरह,
तब क्‍यों न तुलना करें महासागर से?
कवियों ने हमें बताया ''जीवन एक असीम महासागर है'',
और नहाते रहे अपने ही आँसुओं के डबरे में।
सो हम इस महासागर में अकेले यात्रा करने और
अपने डर पीछे छोड़ देने की
भ्रान्‍त धारणा को अनावृत करते हैं...


कितना प्‍यारा दृश्‍य!
इसकी स्‍तब्‍धकारी महातरंगों को देखने
या इसकी हवा भी अपनी छाती में भरने के बाद
आप यहाँ से हटना नहीं चाहते
क्‍योंकि इसके खारे पानी का स्‍वाद बाँध लेता है आपको
और इसके लहरों की अनुगूँजें आप हृदय में सुनते रहते हैं
जैसे कि सीपी की आवाज़ें...


उमड़ो, लहराओ, ओ समुद्र!
कभी नहीं चखी है तुमने यह आज़ादी, यह सहजता...
हालांकि तुम्‍हारी गहराइयों में पड़े हुए हैं कुछ जहाज निस्‍पन्‍द
नये जलपोत -- तुम्‍हारे गौरव! अभिनन्‍दन करते हैं समीर का...
उमड़ो, लहराओ, जनगण की महातरंगो!
उमड़ो, लहराओ, मानव जाति के महासागर!


मैं क्‍या हूँ नहीं जानता मैं
एक छोटी सी नाव या एक टापू -- एक ठोस टुकड़ा,
परवाह न करो, बहुमूल्‍य जीवन, मत बख्‍शो मेरी छाती,
अनवरत, मेरे हृदय पर, जैसे कि किसी चट्टान पर
चोट करो अपनी लहरों से...


कायल हूँ मैं इस प्रचण्‍ड मानव महासागर का,
हुलसता हूँ मैं महाद्वीपों को जलप्‍लावित करती इसकी लहरों से।
भले ही कुछ दम्‍भी तिरस्‍कार करें इन कलाहीन विचारों का,
लेकिन मेरे लिए जीवन -- मानवजाति -- और बेचैन महासागर
एक बिम्‍ब है जो कभी पुराना नहीं पड़ता
और सभी विलक्षण -- सुस्‍पष्‍ट बिम्‍बों
से अधिक प्रदीप्‍त लगता है हमेशा ही...


उमड़ो, लहराओ, ओ सागर जीवन से भरपूर!
उमड़ो, लहराओ तुम, जनगण की महातरंगो!
देखो, काव्‍यात्‍मक अनुरक्ति के हाथों से
हम गतिमान करते हैं धरती माँ को,
अनवरत गतिमान...

-- एदुअर्द्स मीज़ेलाइतिस

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