Friday, August 08, 2014

शब्‍दों का घर





हेलेना विलाग्रा ने सपना देखा कि कवि शब्‍दों के घर में प्रवेश कर रहे हैं। शब्‍द काँच की पुरानी बोतलों में रखे हुए थे, वे कवियों का इन्‍तजार कर रहे थे, और अपने को पेश कर रहे थे और चुने जाने की चाहत से पागल हो रहे थे: वे कवियों से याचना कर रहे थे कि वे उनपर निगाह डालें, उन्‍हें सूँघें, उन्‍हें छूएँ, उन्‍हें चाटें। कवि बोतलों को खोलते थे, अपनी ऊँगलियों के पोरों से शब्‍दों को आजमाते थे, और अपने होंठ चुभकारते थे या नाक सिकोड़ते थे। कवि उन शब्‍दों की तलाश में थे जिन्‍हें वे जानते नहीं थे और उन शब्‍दों की भी, जिन्‍हें वे जानते थे और खो चुके थे।
शब्‍दों के घर में रंगों की एक टेबुल भी थी। वे अपने को ढेरों फौव्‍वारों के रूप में पेश करते थे और हर कवि वह रंग ले लेता था जो वह चाहता था: नींबुई पीला या सूरज की रोशनी जैसा पीला, सागर जैसा नीला या धुँए जैसा, किरमिजी लाल, खून जैसा लाल या वाइन जैसा लाल...

-- एदुआर्दो गालिआनो

1 comment:

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