Monday, July 07, 2014

दलित स्त्रियों के बर्बर उत्‍पीड़न की घटनाओं की वर्गीय अंतर्वस्‍तु


--कविता कृष्‍णपल्‍लवी

हाल के दिनों में दलित स्त्रियों के साथ बर्बर बलात्‍कार, अपहरण और हत्‍या की जितनी घटनाएँ घटी हैं, वे सभी गाँवों के ग़रीब किसान या भूमिहीन मज़दूर परिवारों की थीं। इसके पहले के आँकड़े भी ऐसे ही रहे हैं। अत: इन घटनाओं की वर्गीय अन्‍तर्वस्‍तु की अनदेखी कत्‍तई नहीं की जा सकती। स्त्रियों के साथ बर्बरता वर्गीय दमन-उत्‍पीड़न का एक उपकरण है, बेशक इसका एक जातिगत पहलू भी है क्‍योंकि गाँवों की 90 प्रतिशत दलित आबादी सर्वहारा या अर्द्धसर्वहारा है। चुनौतीपूर्ण कार्यभार यह है कि अन्‍य जातियों के मेहनतक़शों के जातिगत पूर्वाग्रहों को तोड़कर उन्‍हें उनके दलित वर्गबंधुओं के साथ कैसे खड़ा किया जाये। ज़रूरत इस बात की है कि सभी इंसाफपसंद, प्रगतिशील बुद्धिजीवी ऐसी घटनाओं का सक्रिय और पुरजोर प्रतिरोध करें। और यह हो भी रहा है।
जो दलित बुद्धिजीवी मिर्चपुर और भगाणा जैसी घटनाओं का प्रतिरोध केवल जातिगत आधार पर करने की संकीर्णतावादी बातें करते हैं वे प्रतिरोध की ताकत को वस्‍तुगत तौर पर कमजोर करने का ही काम करते हैं।
ग़ौरतलब यह भी है कि भगाणा के उत्‍पीड़ि‍त महीने भर से भी अधिक समय से जंतर-मंतर पर बैठे हैं, पर उनके समर्थन में प्रदर्शन में हिस्‍सा लेते आग उगलने वाले नामवर दलितवादी बुद्धिजीवी और साहित्‍यकार कहीं नहीं नज़र आये। भगाणा के उत्‍पीड़ि‍तों के पक्ष में जो छात्र-युवा लगातार सक्रिय रहे, उनमें दलितों से कहीं अधिक ग़ैरदलित लोग थे। यह एक अच्‍छी बात है। साथ ही यह कागजों पर ब्राह्मणवाद के विरुद्ध महज जुबानी जमाखर्च करते रहने वाले भाँति-भाँति के दलितवादियों और 'पहचान की राजनीति' के अलमबरदारों के असली  चेहरे  को भी उजागर करता है।

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