Wednesday, March 19, 2014



पूँजी खेले ओक्‍का-बोक्‍का
सत्‍ता बोले तीन तलोक्‍का।
नेता, गाड़ी, भोंपा, झाँसा
सट्टा,जूआ, चौपड़, पाँसा।
दारू, चिकना, बोटी, ता-धा
चमचे-गुण्‍डे आदा-पादा। 
धूमधड़क्‍का, पों पों पों
फट्टक फैंया, धम्‍मक धों।
यह चुनाव का खेला है
सोनपुर का मेला है।
मेला फिर उठ जावैगा
सब पहले सा हो जावैगा।
सुन भाई जग्‍गू सुन-सुन-सुन
काम की बातें मन में गुन।
कोई दल जीते-हारे
हरदम जनता ही हारे।
पर ऐसा दिन आवैगा
मेहनतक़श सबक सिखावैगा।
महाक्रान्ति की ताल बजेगी
पूँजी की फिर चिता सजेगी।
जनता की यह मति होगी
यही जगत की गति होगी।

-कविता कृष्‍णपल्‍लवी

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