Wednesday, March 19, 2014


आ गये फिर से चुनाव
बढ़ गये हैं सभी गुण्‍डों-मवालियों-दलालों-हरामियों के भाव ।
यह लोकतंत्र है मेहनतक़शों के लिए बस एक ख़ौफ़नाक कहर
सुनना छल-कपट, झूठ भरे भाषण और मतपत्रों पर लगाना मुहर ।
फिर पाँच साल सूअर लगायेंगे संसद में लोट
सरकार करेगी पूँजी की ताबेदारी और जनता पर चोट पर चोट ।
पूँजी का होता रहेगा विस्‍तार 
जनता के दुखों का नहीं कोई निस्‍तार ।
बढ़ती रहेगी परजीवियों की बेनामी सम्‍पत्ति, चर्बी और मोटापा
बारी-बारी से झेलेंगे हम मनमोहनापा, मोदियापा या कोई और चूतियापा ।
यह सिलसिला तो जारी रहेगा जनाब!
सोचना ही होगा आपको, चुनना ही होगा: 'इलेक्‍शन या इंकलाब'!

--कविता कृष्‍णपल्‍लवी

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