Sunday, April 14, 2013

इतिहास का मार्क्‍सवादी सिद्धान्‍त



(इतिहास की वैज्ञानिक भौतिकवादी समझ विकसित करने में कार्ल मार्क्स की  ऐतिहासिक भूमिका पर फ़्रेडरिक एंगेल्स की इस सारगर्भित संक्षिप्त टिप्पणी से बहुत कम लोग परिचित हैं। मार्क्सवाद के गंभीर अध्येताओं से अपेक्षा है कि वे इसे ठहर-ठहरकर, चिन्तन-मनन करते हुए पढ़ेंगे!)

इतिहास का मार्क्‍सवादी सिद्धान्‍त


इतिहास का पहले का पूरा दृष्टिकोण इस धारणा पर आधारित था कि सभी तरह के ऐतिहासिक परिवर्तनों का मूल कारण मनुष्‍यों के परिवर्तनशील विचारों में ही मिलेगा और सभी तरह के ऐतिहासिक परिवर्तनों में सबसे महत्‍वपूर्ण राजनीतिक परिवर्तन ही हैं तथा सम्‍पूर्ण इतिहास में उन्‍हीं की प्रधानता है। लेकिन लोगों ने यह प्रश्‍न न किया था कि मनुष्‍य के दिमाग में ये विचार आते कहाँ से हैं और राजनीतिक परिवर्तनों की प्रेरक शक्तियाँ क्‍या हैं। केवल फ्रांसीसी और कुछ-कुछ अंग्रेज इतिहासकारों की नवीनतर शाखा में यह विश्‍वास बरबस प्रविष्‍ट हुआ था कि कम से कम मध्‍ययुग से, सामाजिक और राजनीतिक प्रभुत्‍व के लिए उदीयमान पूँजीपति वर्ग का सामंती अभिजात वर्ग के साथ संघर्ष यूरोप के इतिहास की प्रेरक शक्ति रहा है। मार्क्‍स ने सिद्ध कर दिया है कि अब तक का  सारा इतिहास वर्ग-संघर्षों का इतिहास है, अब तक के सभी विविधरूपी और जटिल राजनीतिक संघर्षों की जड़ में केवल सामाजिक वर्गों के राजनीतिक और सामाजिक शासन की समस्‍या, पुराने वर्गों द्वारा अपना प्रभुत्‍व बनाये रखने तथा नये पनपते हुए वर्गों द्वारा इस प्रभुत्‍व को हस्‍तगत करने की समस्‍या ही रही है। लेकिन इन वर्गों के जन्‍म लेने और कायम रहने के कारण क्‍या हैं? इनका कारण वे शुद्ध भौतिक, गोचर परिस्थितियाँ हैं, जिनके अर्न्‍तगत समाज किसी भी युग मे अपने जीवन-यापन के साधनों का उत्‍पादन और विनिमय करता है। मध्‍ययुग के सामन्‍ती शासन का आधार छोटे-छोटे कृषक समुदायों की स्‍वावलम्‍बी अर्थव्‍यवस्‍था था, जो अपनी ज़रूरत की प्राय: सभी चीज़ों का स्‍वयं उत्‍पादन कर लेते थे। इनमें विनिमय का प्राय: पूर्ण अभाव था, शस्‍त्रधारी सामन्‍त बाहर के आक्रमणों से इनकी रक्षा  करते थे, उन्‍हें जातीय या कम से कम राजनीतिक एकता प्रदान करते थे। नगरों के अभ्‍युदय के साथ अलग-अलग दस्‍तकारियों और परस्‍पर व्‍यापार का विकास हुआ जो पहले आन्‍तरिक क्षेत्र में सीमित था और आगे चलकर अन्‍तरराष्‍ट्रीय हो गया। इस सब के साथ नगर के पूँजीपति वर्ग का विकास हुआ और मध्‍ययुग में ही उसने सामन्‍तों से लड़-भिड़कर सामन्‍ती व्‍यवस्‍था के अन्‍दर एक विशेषाधिकारप्राप्‍त श्रेणी के रूप में अपने लिए स्‍थान बना लिया। परन्‍तु 15वीं शताब्‍दी के मध्‍य के बाद से, यूरोप के बाहर की दुनिया का पता लगने पर, इस पूँजीपति वर्ग अपने अपने व्‍यापार के लिए कहीं अधिक विस्‍तृत क्षेत्र मिल गया। इससे उसे अपने उद्योग धन्‍धों के लिए नयी स्‍फूर्ति मिली। प्रमुख शाखाओं में दस्‍तकारी का स्‍थान मैनुफैक्‍चर ने ले लिया जो अब फैक्‍टरियों के पैमाने पर स्‍थापित था।फिर इसकी जगह बड़े पैमाने के उद्योग ने ले ली जो पिछली सदी के आविष्‍कारों, खासकर भाप से चलने वाले इंजन के आविष्‍कार से सम्‍भव हो गया था। बड़े पैमाने के उद्योग का व्‍यापार पर यह प्रभाव पड़ा कि पिछड़े हुए देशों में पुराना हाथ का काम ठप हो गया और उन्‍नत देशों में उसने संचार के आधुनिक नये साधन - भाप से चलने वाले जहाज, रेल, वैद्युतिक तार - उत्‍पन्‍न किये। इस प्रकार पूँजीपति वर्ग सामाजिक सम्‍पत्ति और सामाजिक शक्ति दोनों को अधिकाधिक अपने हाथों में केन्द्रित करने लगा, यधपि काफी अरसे तक राजनीतिक सत्‍ता से वह वंचित रहा जो सामंतों और उनके द्वारा समर्थित राजतंत्र के हाथ में थी। लेकिन विकास की एक मंजिल ऐसी आयी - फ्रांस में महान क्रान्ति के बाद - जब उसने राजनीतिक सत्‍ता को भी हथिया लिया, और तब से वह सर्वहारा वर्ग और छोटे किसानों के ऊपर शासन करने वाला वर्ग बन गया। इस दृष्टिकोण से, समाज की विशेष आर्थिक स्थिति का सम्‍यक ज्ञान होने से  सभी ऐतिहासिक घटनाओं से बड़ी सरलता से व्‍याख्‍या की जा सकती है,  यधपि यह सही है कि हमारे पेशेवर इतिहासकारों में इस ज्ञान का सर्वथा अभाव है। इसी प्रकार हर ऐतिहासिक युग की धारणाओं और उसके विचारों की व्‍याख्‍या बड़ी सरलता से, उस युग की आर्थिक जीवनावस्‍थाओं और सामाजिक तथा राजनीतिक सम्‍बन्‍धों के आधार पर (ये सम्‍बन्‍ध भी आर्थिक परिस्थितियों द्वारा ही निर्धारित होते हैं), की जा सकती है। इतिहास को पहली बार अपना वास्‍तविक आधार मिला। यह आधार एक बहुत ही स्‍पष्‍ट सत्‍य है जिसकी ओर पहले लोगों का ध्‍यान बिल्‍कुल नहीं गया था, यानी यह सत्‍य कि मनुष्‍यों को सबसे पहले खाना-पीना, ओढ़ना-पहनना और सिर के ऊपर साया चाहिए, इसलिए पहले उन्‍हें लाजि़मी तौर पर काम करना होता है, जिसके बाद ही वे प्रभुत्‍व के लिए एक दूसरे से झगड़ सकते हैं, और राजनीति, धर्म, दर्शन, आदि को अपना समय दे सकते हैं। आखि़रकार इस स्‍पष्‍ट सत्‍य को अपना ऐतिहासिक अधिकार प्राप्‍त हुआ।
समाजवादी दृष्टिकोण के लिए इतिहास की यह नयी धारणा सर्वोच्‍च महत्‍व की थी। इससे पता लगा कि पहले के सम्‍पूर्ण इतिहास की गति वर्ग-विरोधों और वर्ग-संघर्षों के बीच में रही है, कि शासक और शासित, शोषक और शोषित वर्गों का अस्तित्‍व बराबर रहा है और यह कि मानव जाति के अधिकांश भाग के पल्‍ले सदा से कड़ी मशक्‍़क़त पड़ी है, आनन्‍दोपभोग बहुत कम। ऐसा क्‍यों हुआ? इसीलिए कि मानव जाति के विकास की सभी पिछली मंज़ि‍लों में उत्‍पादन का विकास इतना कम हुआ था कि ऐतिहासिक विकास इस अन्‍तरविरोधी रूप में ही हो सकता था, ऐतिहासिक प्रगति कुल मिलाकर एक विशेषाधिकारप्राप्‍त अल्‍पसंख्‍यक समुदाय के क्रियाकलाप का ही विषय बना दी गयी थी, और बहुसंख्‍यकों के भाग्‍य में अपने श्रम द्वारा जीवन-निर्वाह के अपने स्‍वल्‍प साधन और इसके अतिरिक्‍त विशेषाधिकार संपन्‍न समुदाय के लिए अधिकाधिक प्रचुर साधन उत्‍पादित करना रह गया था। परन्‍तु इतिहास की यही जांच-पड़ताल, जो हमें इस प्रकार पहले के वर्ग शासन की स्‍वाभाविक एवं बुद्धिसम्‍मत व्‍याख्‍या प्रदान करती है (अन्‍यथा हम मानव-स्‍वभाव की दुष्‍टता द्वारा ही उसकी व्‍याख्‍या कर सकते थे), साथ ही साथ हमें यह बोध कराती है कि वर्तमान युग में उत्‍पादन शक्तियों के अति प्रचण्‍ड विकास के कारण मानव-जाति को शासक और शासित, शोषक और शोषित में बांट रखने का अन्तिम बहाना भी, कम से कम स‍बसे उन्‍नत देशों में, मिट चुका है; कि शासक बड़े पूँजीपति अपनी ऐतिहासिक भूमिका समाप्‍त कर चुके हैं, और जैसा कि व्‍यापारिक संकटों, और खासकर पिछली भयानक गिरावट और सभी देशों में फैली मन्‍दी से सिद्ध हो चुका है, वे समाज का नेतृत्‍व करने के योग्‍य अब नहीं रह  गये हैं, बल्कि उत्‍पादन के विकास में बाधक बन गये हैं; कि ऐतिहासिक नेतृत्‍व सर्वहारा वर्ग के हाथ में चला गया है, ऐसे वर्ग के हाथ में चला गया है जो समाज में अपनी समग्र स्‍थिति के कारण सम्‍पूर्ण वर्ग शासन, सम्‍पूर्ण दासता एवं सम्‍पूर्ण शोषण का अन्‍त करके ही अपने को मुक्‍त कर सकता है; और यह कि सामाजिक उत्‍पादक शक्तियाँ, जो इतनी विकसित हो गयी हैं कि पूँजीपति वर्ग के काबू से बाहर है, बस इस प्रतीक्षा में है कि एकजुट सर्वहारा उन्‍हें अपने हाथों में ले ले जिससे कि ऐसी अवस्‍था कायम की जा सके जिसमें समाज का प्रत्‍येक सदस्‍य न केवल सामाजिक सम्‍पदा के उत्‍पादन में, बल्कि वितरण और प्रबन्‍ध में भी हाथ बंटा  सकेगा, और जो अवस्‍था सम्‍पूर्ण उत्‍पादन  के नियोजित संचालन द्वारा सामाजिक उत्‍पादक शक्तियों और उनकी उपज को इतना बढ़ा देगी कि प्रत्‍येक व्‍यक्ति की सभी उचित आवश्‍यक्‍ताओं की उत्‍तरोत्‍तर बढ़ती मात्रा में पूर्ति सुनिश्चित हो जायेगी।

-फ्रेडरिक एंगेल्‍स ('कार्ल मार्क्‍स' 1877, ''volks-kalender'' नामक वार्षिकी के लिए लिखी गयी जीवनी)

2 comments:

  1. महत्वपूर्ण आलेख ....उम्मीद है यह काम एक श्रंखला बनेगा और उसका विस्तार होगा.

    ReplyDelete