Sunday, February 24, 2013

शालिनी के साथ दिन-रात


लगभग एक महीने का समय मेरे लिए दु:ख और उदासी के साथ-साथ अदम्‍य जिजीविषा और युयुत्‍सा का साक्षी होने का एक विचित्र दौर रहा है। इन दिनों ने मुझे जि़न्‍दगी से प्‍यार, मृत्‍यु के प्रतिरोध, उसूलों के प्रति गहन आत्मिक निष्‍ठा और आशावाद की नयी परिभाषा से परिचित कराया है। हमारे अपनों की ज़िन्‍दगी कभी-कभी हमें किताबों से बहुत अधिक सिखा जाती। 

हमलोगों की प्रिय साथी शालिनी इन दिनों मेटास्‍टैटिक कैंसर की बीमारी से फैसलाकुन लड़ाई लड़ रही है। जनवरी से यह जंग जारी है। (विचित्र विडम्‍बना यह है कि इस किस्‍म के कैंसर का पता 90प्रतिशत मामलों में तीसरे-चौथे स्‍टेज में ही चल पाता है) लगातार तरह-तरह की जाँचों, कीमोथेरेपी, पेट से तरल निकलवाने के लिए बार-बार अस्‍पताल जाना, भरती होना, वापस लौटना, बेइंतहां दर्द और तकलीफ, रतजगा और उल्टियाँ, तेजी से छीजते शरीर को रोज़ महसूस करना - यही शालिनी के रोज़-रोज़ का जीवन बन गया है। ऐलोपैथिक पद्धति के अनुसार यह रोग असाध्‍य है। इसमें बस यही किया जा सकता है कि पीड़ा कम की जा सके और जीने की अवधि कुछ बढ़ाई जा सके। लेकिन उम्‍मीदों के अन्‍य स्रोत भी हैं। कुछ आश्‍वस्तियों के आधार पर होम्‍योपैथी चिकित्‍सा और फ्रूट थेरेपी (ब्राजील के फल गुयाबानों और उसकी पत्तियों की चाय से किया जाने वाला इलाज) भी जारी है। मेडिकल रिपोर्टों के आधार पर शुभेच्‍छु मित्रों के जरिए देश और विदेश के कुछ प्रसिद्ध कैंसर विशेषज्ञों के परामर्श भी हमें मिल रहे हैं। इलाज का भारी ख़र्च उठाने में भी वे शुभचिन्‍तक ही मदद कर रहे हैं। जो ऐसे सामाजिक कार्यकर्ता की जीवन-रक्षा में योगदान अपना फ़र्ज मानते हैं।

राजनीतिक सामाजिक कार्यों में मैं और शालिनी लगभग साथ ही आये थे। क़रीब सत्रह वर्षों की दोस्‍ती रही है।हमलोग छात्रों के मोर्चे पर रहे, स्त्रियों के मोर्चे पर और बच्‍चों के मोर्चे पर काम किया, बहुतेरे आन्‍दोलन और अभियान चलाये, कार्यशालाओं और अध्‍ययन शिविरों में हिस्‍सा लिया। बाद में अलग-अलग शहरों में रहे, कामों से और आयोजनों के दौरान मिलते रहे। शालिनी तकनीकी कार्यों की 'सुपर-एक्‍सपर्ट' हो गयी। मैं जन-मोर्चे पर लगी। शालिनी जैसा हममें कोई नहीं था। इसका नतीज़ा है कि वह पुस्‍तक प्रतिष्‍ठान 'जनचेतना' का लखनऊ स्थित केन्‍द्र की प्रभारी है, बच्‍चों के लिए गठित संस्‍था 'अनुराग ट्रस्‍ट' की एक न्‍यासी है, परिकल्‍पना प्रकाशन की निदेशक है, राहुल फाउण्‍डेशन के प्रकाशन का काम देखती है और अरविन्‍द स्‍मृति न्‍यास का पुस्‍तकालय भी सम्‍भालती है। इसमें कोई भी काम रस्‍मी नहीं है। कम्‍पोजि़ग, प्रूफरीडिंग, प्रिण्टिंग, पुस्‍तक प्रदर्शनी, हिसाब-किताब - किसी जादुई हिकमत से शालिनी सबकूछ कर लेती है।

उसूली दृढ़ता शालिनी की अकुण्‍ठ-निष्‍कम्‍प रही है। उसूलों को लेकर परिवार से एक बार जो विच्‍छेद किया, तो फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। अनुशासन में बेहद कठोर (इसका कहर हम सभी पर कभी न कभी टूटा है),पर लगाव और सरोकार के मामले में उतनी ही बेजोड़।

ऐसे साथी को, इतने पुराने सहयात्री को इस हाल में देखना कितना यातनादायी है, यह समझा जा सकता है। पर शालिनी मौत के ख़तरे के सामने भी उतनी ही जि़द के साथ खड़ी है, जैसे वह अपने लक्ष्‍य के शत्रुओं और राह की बाधाओं के विरुद्ध खड़ी रही है। दर्द उसे नहीं तोड़ रहा है, वह दर्द को तोड़ रही है। असहनीय पीड़ा, अनिद्रा की थकान और कमजोरी के बीच जब थोड़ी ऊर्जा संचित कर लेती है तो कामों की समस्‍याओं और भविष्‍य की योजनाओं की बातें करती हैा उसे विश्‍वास है कि वह कैंसर को पराजित कर देगी। उसका विश्‍वास हमलोगों की ताक़त है। उसे चिन्‍ता होती है कि उसकी तीमारदारी में साथियों को कितना श्रम और समय लगाना पड़ता है और इससे कामों का कितना नुकसान होता है! तब उसे डाँटना पड़ता है कि ऐसा सोचकर वह हमलोगों की भावनाओं को आहत न करे। वह हम लोगों  की ज़िन्‍दगी का हिस्‍सा है।

शालिनी का संघर्ष 'आनन्‍द' फिल्‍म के नायक जैसा रोमानी आशावादी नहीं है, न ही 'सफर' के नायक जैसा उदासी भरा है। वह हमलोगों की निकोलाई आस्‍त्रोव्‍स्‍की है। उसने अपना अन्तिम इच्‍छापत्र shaliniatjanchetna.blogspot.com ब्‍लॉग पर 'शालिनी का पन्‍ना' स्‍तम्‍भ के अंतर्गत लिखा है, जिसे हर संवेदनशील पाठक को पढ़ना ही चाहिए। देहदान की औपचारिकताएँ भी वह जल्‍दी से जल्‍दी पूरी करने की जि़द कर रही है। यानी हर स्थिति के लिए तैयार होकर वह युद्धरत है। सघन पीड़ा के बीच भी समय के क़तरे बचाकर, ताक़त सँजोकर पसंदीदा कि़ताबें पढ़ती है या पढ़वाकर सुनती है। कभी-कभी नोट्स भी लेती है। हमें शालिनी की दोस्‍त होने पर नाज़ है! कौन होगा जो ऐसी बहादुर लड़की की दोस्‍त नहीं बनना चाहेगा?

(शालिनी की जीवन-रक्षा के लिए जारी अभियान के बारे में, शालिनी के बारे में जानने के लिए, उसकी मेडिकल बुलेटिन से अवगत होने के लिए, शालिनी की डायरी के नोट्स पढ़ने के लिए और शालिनी को संदेश भेजने के लिए अवश्‍य देखें: shaliniatjanchetna.blogspot.com  और फेसबुक पर भी शेयर करें)

6 comments:

  1. thanks shalini ji ke bare me poori tarah se batane ke liye .ve avshay apni jang jeetengi hame aasha hai vishvas hai .

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    1. प्रिय साथी,
      आप शालिनी के संघर्ष के साथ हैं। यह बात हमलोगों के हौसले को बढ़ाती है।

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  2. शालिनी के बारे में पढ़ते हुए बरबस गोरख पांडे की ये पंक्तियां याद हो आईं - दुख तुम्हें क्या तोड़ेगा, तुम दुख को तोड़ दो, बस अपनी आंखें औरों के सपने से जोड़ दो।
    सच, ऐसे लोग दर्द से टूटते नहीं, दर्द को तोड़ कर रख देते हैं। आप ख़ुशकिस्‍मत हैं कि ऐसी जानदार और शानदार दोस्‍त के साथ हैं। उन्‍हें ज़रूर बताइएगा, हम सब उनके साथ हैं। वे भी हमारे साथ हैं, हमें भी ज़िन्‍दगी के दर्दों से लड़ने का हौसला देते हुए।

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    1. प्रिय साथी,
      हमें विश्‍वास है कि बहुत सारे सच्‍चे दिल वाले लोग शालिनी के हौसले और संघर्ष का साथ देंगे। मेरा अनुरोध है कि आप शालिनी के ब्‍लॉग पर भी अपना संदेश ज़रूर दें, इससे उसके हौसलों को मज़बूती मिलेगी।

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