Sunday, June 05, 2011

मेरी मानो तो...

तय करते जाना
फासले-दर-फासले ।
कहीं रुकना भी किसी बस्‍ती में
तो अपनी कोई अमानत
नहीं रखना किसी के पास।
ठगे जाओगे।
बात मानो ।
हम भी एक मुसाफिर हैं
दिलों की बस्तियों से
गुज़रते रहे हैं
बार-बार।

-कविता कृष्‍णपल्‍लवी

3 comments:

  1. चले चलो दिलों में घाव लेके भी चले चलो....

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  2. जनाब राहगीर जी, आपकी टिप्‍पणी कुछ बेमौसम के राग जैसी है. ब्रजमोहन का गीत किस संदर्भ में है और कविता जी की कविता किस संदर्भ में, बिना कुछ समझे बस दिल पढ़ा और उठा कर एक लाइन जड़ दी. ख़ैर, कविताएं पढ़ते रहा करिए, धीरे-धीरे समझ भी आने लगेंगी....

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  3. भाई विवेक जी, आपने राय दी अच्‍छा लगा। सही कहा है, कविता पढ़ते रहने से समझ भी आने लगती है। मगर हुजूर, कविता की यही तो खूबी होती है कि एक ही कविता के अर्थ अलग-अलग पढ़ने वाले के लिए अलग-अलग खुलते हैं। मुझे कोई शौक नहीं है कि बस अपना नाम जताने के लिए कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा जोड़ता रहूं। कविता की दुनिया लोकतांत्रिक होती है, उसमें अपनी समझ की तानाशाही तो न चलाइये...

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