Friday, June 24, 2011

फैसला


आदर्शों के कोड़े खाकर
बिदका मन का घोड़ा।
थोड़ा जीवन धूल में उड़ा
गाद में गिरा थोड़ा।
जाने किन-किन दीवारों से
जा-जाकर सिर फोड़ा।
दूर बैठकर देख रहा था
सब कुछ समय निगोड़ा।
चाहे जो भी हो पर
कहलाएंगे नहीं भगोड़ा।
यही ठानकर नैया को
हमने धारा में मोड़ा।

          -कविता कृष्‍णपल्‍लवी 

1 comment:

  1. चाहे जो भी हो पर
    कहलाएंगे नहीं भगोड़ा।
    यही ठानकर नैया को
    हमने धारा में मोड़ा।

    Behtreen .....Sakaratmak bhav

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