Wednesday, March 02, 2011

जीवन लक्ष्‍य


कठिनाइयों से रीता जीवन मेरे लिये नहीं,
नहीं,
मेरे तूफानी मन को यह स्‍वीकार नहीं।
मुझे तो चाहिए एक महान ऊंचा लक्ष्‍य
और उसके लिए ताउम्र संघर्षों का अटूट सिलसिला।
ओ कला! तू खोल
मानवता की धरोहर
अपने अमूल्‍य कोषों के द्वार मेरे लिए खोल!
अपनी प्रज्ञा और संवेगों के आलिंगन में
अखिल विश्‍व को बांध लूंगा मैं!
आओ,
हम बीहड़ और कठिन सुदूर यात्रा पर चलें
आओ, क्‍योंकि छिछला, निरुद्देश्‍य और लक्ष्‍यहीन
जीवन हमें स्‍वीकार नहीं।
हम, ऊंघते कलम घिसते हुए
उत्‍पीड़न और लाचारी में नहीं जियेंगे।
हम - आकांक्षा, आक्रोश, आवेग और
अभिमान से जियेंगे।
असली इंसान की तरह जियेंगे।

                       -कार्ल मार्क्‍स(1836)
                      (मार्क्‍स जब 18 वर्ष के थे) 

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