Sunday, February 20, 2011



जब मन चाहे
आत्‍मा के जख्‍़मों, प्‍यास, प्रतीक्षा ,
पागल चाहतों और बेचैन यादों के बारे में
बातें करने को,
तब चाय बनाओ
दोस्‍तों के लिए,
घर की सफाई करो
किताबों को
तरतीब से सजाओ
और कुछ खाने-पीने का प्रोग्राम बनाओ।
यही दस्‍तूर है इस शहर का
पर यहां रहते हैं
कुछ समझदार भी
और कुछ समझदार होने का वहम पाले
कुछ लाल बुझक्‍कड़ भी।
                                     -कविता कृष्‍णपल्‍लवी

4 comments:

  1. उत्तम प्रस्तुति...

    हिन्दी ब्लाग जगत में आपका स्वागत है, कामना है कि आप इस क्षेत्र में सर्वोच्च बुलन्दियों तक पहुंचें । आप हिन्दी के दूसरे ब्लाग्स भी देखें और अच्छा लगने पर उन्हें फालो भी करें । आप जितने अधिक ब्लाग्स को फालो करेंगे आपके अपने ब्लाग्स पर भी फालोअर्स की संख्या बढती जा सकेगी । प्राथमिक तौर पर मैं आपको मेरे ब्लाग 'नजरिया' की लिंक नीचे दे रहा हूँ आप इसके आलेख "नये ब्लाग लेखकों के लिये उपयोगी सुझाव" का अवलोकन करें और इसे फालो भी करें । आपको निश्चित रुप से अच्छे परिणाम मिलेंगे । शुभकामनाओं सहित...
    http://najariya.blogspot.com/2011/02/blog-post_18.html

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  2. शुभकामनाएँ...

    हिन्दी ब्लाग जगत में शिखर तक की यात्रा करने के सुप्रयास हेतु आर नजरिया ब्लाग में नये ब्लाग लेखकों के लिये उपयोगी सुझाव अवश्य पढें ।
    http://najariya.blogspot.com

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  3. अनूठी रचना जो सबसे अलग और हटकर लगी - बधाई

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