Saturday, January 08, 2011

मेरी प्रिय कविताऍ:क्षितिज पर जलती मशालें दण्‍डद्वीप से दिखती हुई



इतने भले नहीं बन जाना साथी

इतने भले नहीं बन जाना साथी
जितने भले हुआ करते हैं सरकस के हाथी
गदहा बनने में लगा दी अपनी सारी कूवत सारी प्रतिभा
किसी से कुछ लिया नहीं न किसी को कुछ दिया
ऐसा भी जिया जीवन तो क्‍या जिया?
इतने दुर्गम मत बन जाना
सम्‍भव ही रह जाये न तुम तक कोई राह बनाना
अपने ऊंचे सन्‍नाटे में सर धुनते रह गये
लेकिन किंचित भी जीवन का मर्म नहीं जाना
इतने चालू मत हो जाना
सुन-सुन कर हरकतें तुम्‍हारी पड़े हमें शरमाना
बगल दबी हो बोतल मुंह में जनता का अफसाना
ऐसे घाघ नहीं हो जाना
ऐसे कठमुल्‍ले मत बनना
बात नहीं हो मन की तो बस तन जाना
दुनिया देख चुके हो यारो
एक नजर थोड़ा सा अपने जीवन पर भी मारो
पोथी-पतरा-ज्ञान-कपट से बहुत बड़ा है मानव
कठमुल्‍लापन छोड़ो, उस पर भी तो तनिक विचारो
काफी बुरा समय है साथी
गरज रहे हैं घन घमण्‍ड के नभ की फटती है छाती
अन्‍धकार की सत्‍ता चिल-बिल चिल-बिल मानव-जीवन
जिस पर बिजली रह-रह अपना चाबुक चमकाती
संस्‍कृति के दर्पण में ये जो शक्‍लें हैं मुस्‍काती
इनकी असल समझना साथी
अपनी समझ बदलना साथी
                                  
                                                           - वीरेन डंगवाल

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