Sunday, January 09, 2011

मेरी प्रिय कविताऍ:क्षितिज पर जलती मशालें दण्‍डद्वीप से दिखती हुई



गार्गी

मत जाओ गार्गी प्रश्‍नों की सीमा से आगे
तुम्‍हारा सिर कटकर लुढ़केगा ज़मीन पर,
मत करो याज्ञवल्‍क्‍यों की अवमानना,
मत उठाओ प्रश्‍न ब्रह्मसत्‍ता पर,
वह पुरुष है!
मत तोड़ो इन नियमों को।
पुत्री बन पिता का प्‍यार लो
अंकशायिनी बनो
फिर कोख में धारण करो
पुरुष का अंश
मत रचो नया लोकाचार
मत जाओ प्रश्‍नों की सीमा से आगे।
गार्गी, तुम जलो रुपयों की खा़तिर
बिको बीमार बेटे की खा़तिर
नाचो इशारों पर
गार्गी तुम ज़रा स्‍मार्ट बनो
तहज़ीब सीखो
सीढ़ी बन जाओ हमारी तरक्‍़की़ की
गार्गी तुम देवी हो - जीवनसंगिनी हो
पतिव्रता हो गार्गी तुम
हम अधूरे हैं तुम्‍हारे बिना
महान बनने में हमारी मदद करो
दुनिया को फ़तह करने में
आसमान तक चढ़ने में
गार्गी तुम एक रस्‍सी बनो ।
त्‍याग-तप की प्रतिमा हो तुम
सोचो परिवार का हित
अपने इस घर को संभालो
मत जाओ प्रश्‍नों की सीमा से आगे
तुम्‍हारा सिर कटकर लुढ़केगा ज़मीन पर!
                                                             -कात्‍यायनी

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