Thursday, January 20, 2011

मेरे प्रिय उद्धरण और कृति-अंश: कुतुबनुमा से दिशा दिखाते, राह बताते शब्‍द

यह सच है कि हमारी संस्‍कृति इस समय अंधियारे के बीच से गुज़र रही है, परन्‍तु इतिहास-दर्शन के ऊपर यह दायित्‍व है कि वह इस बात का निर्णय ले कि जो अंधियारा इस समय छाया हुआ है वह हमारी संस्‍कृति की, और हमारी अन्तिम नियति है, अथवा भले हम तथा हमारी संस्‍कृति एक लम्‍बी, अंधेरी सुरंग के बीच से गुज़र रहे हों, अन्‍तत: हम उससे बाहर आयेंगे और प्रकाश के साथ हमारा साक्षात्‍कार एक बार फिर होगा। बुर्जुआ सौन्‍दर्यशास्त्रियों का विचार है कि इस अंधियारे के चंगुल से उबरने का कोई भी रास्‍ता शेष नहीं बचा, जबकि मार्क्‍सवादी इतिहास-दर्शन मनुष्‍यता के विकास की व्‍यवस्‍था के क्रम में हमें यह निष्‍कर्ष देता है कि ऐसा हो ही नहीं सकता कि मनुष्‍य की यह विकासयात्रा निरुद्देश्‍यता या निरर्थकता में ही समाप्‍त हो जाये। वह एक निश्‍िचत, सार्थक गन्‍तव्‍य तक अवश्‍य पहुंचेगी।

                                                   - जार्ज लुकाच (स्‍टडीज़ इन यूरोपियन रियलिज्‍म)

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