Friday, January 14, 2011

माल-अंधपूजा का घटाटोप

चीज़े आदमी के लिए होती हैं, न कि आदमी चीज़ों के लिए।

आज की दुनिया में आदमी चीज़ों के लिए हो गया है। आदमी चीज़ों को नहीं बरत रहा है, बल्कि चीज़ें आदमी को बरत रहीं हैं।

जिन चीज़ों का उपयोग मूल्‍य होता है, उन्‍ही का विनिमय मूल्‍य होता है। फिर विनिमय मूल्‍य उपयोग मूल्‍य पर हावी हो जाता है। फिर अपनी सनक को भी हम अपनी ज़रुरत समझने लगते हैं। विज्ञापन हमें बताते हैं कि फ़ला चीज़ हमारे सुंदर या हैसियतदार या प्रभावशाली होने के लिए बेहद ज़रुरी है और हम हर कीमत पर उसे पा लेना चाहते हैं। उस चीज़ के उपयोग मूल्‍य को हम मिथ्‍याभासी तौर पर महसूस करने लगते हैं। बाज़ार में उसकी मांग बढ़ जाती है, उसका उत्‍पादन बढ़ जाता है और उसके उत्‍पादन में लगे मज़दूरों से ज्‍यादा से ज्‍यादा अतिरिक्‍त मूल्‍य उगाहा जाने लगता है। यह माल-अंधपूजा (कमोडिटी फेटेशिज्‍़म) है, जिसे संचार क्रांति ने चरम तक पहुंचा दिया है।

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